शुक्रवार, 28 सितंबर 2012


          
pyks mxk,a iSlks dk isM+               ¼O;aX;½

ÞdkSu dgrk gS iSlks dk isM+ ugh mxrk gS] ,d Hkz’Vkpkj dk cht rks rch;r ls yxkvks ;kjksaAß vc rks vki yksx le> gh x;s gksaxs fd ;g ckr fdruh csekuh gS fd iSls isM+ ij ugha mxrs gSA vjs HkbZ Hkkjr tSls Hkz’Vkpkj ijk;.k ns”k esa Hkh vxj iSls dk isM+ ugha mxs rks ykur  gS gekjh iwjh LoPNUn O;oLFkk ijA vc [kqn lksfp, usrkfxjh esa vkus ls igys tks cank VwVh lkbZfdy ij lokjh djrk gks] egt ,d pquko thrus ij og ekuuh; pepekrh LdkfiZ;ksa ls pyus yx tk,A tks “k[l VwVs QwVs ,yvkbZth ¶YkSV esa jgrk gks vkSj ea=h in ikrs gh vkyh”kku caxys dk ekfyd cu tk,aA tks tukc yksxksa ls m/kkj ekaxrs ugha Fkdrs og fdlh [ksy vk;kstu desVh dk v/;{k curs gh djksM+ksa vjcksa esa [ksyus yxs rks crkb;s fd ;g peRdkj fcuk fdlh iSlsk ds isM+ ds laHko gS HkykA
      Hkkjr tSl Hkz’Vkpkfj;ksa ds izfr lfg’.kq ns”k esa rks iSlks ds isM+ yxkus dk vfr mi;qDr o vuqdwy okrkoj.k lky ds ckjgks eghus cuk jgrk gSA cl FkksM+h lh prqjkbZ dk gy pykdj ykyp ds cht cks nhft,] /kwrZrk dh [kkn fNMd nhft, fQj mlesa csbZekuh dh flapkbZ dj nhft, vkSj eDdjkas dks mldh fgQktr esa yxk nhft, fQj nsf[k, dSls ygygkrk gS vkidk iSlksa dk isM+A ets dh ckr ;g gS fd bl isM+ esa vc yk[kksa& djksM+ksa ugha vjcksa& [kjcksa ds iSls fudy jgs gSaA
      oSls iSls dk isM+ rks gj ml {ks= esa yxk;k tk ldrk gS tgka O;fDr viuk bZeku cspus dks rS;kj jgrk gksaA ysfdu orZeku ifjos”k es ftl rjg u;s&u;s ?kksVkys dhfrZeku Nw jgs gS mldksa ns[kdj rks ,slk yxrk gS fd ns”k dh jktuhfr dh Hkwfe bl iSlksa ds isM+ ds fy, lokZf/kd moZjk fl) gks jgh gSA dkWeuosYFk ls dyekM+h lkgc us iSlks dk isM+ yxk;kA Vw th esa ,-jktk us mlls Hkh cM+s isM+ dh N=Nk;k esa yk[kks djksM+ bdV~Bk dj fy,A;g rks NksVs&eksVs >kM+ &>adkM+ VkbZi ds isM+ fudys bu lcesa ckth ekjh dks;ys dh [knku ds vkoaVu esa ?kksVkys usA bruk fo”kky cjxn ljh[kk isM+ fodflr dj fn;k gekjs ekuuh;ksa us fd blds Qy p[kus ek= ls gh mudh lkr iq”rs rks NksfM+;ksa vxyh lRrj iq”rs rd lksus dk pEep ysdj iSnk gksaxhA [kSj ;g rks cM+s&cM+s isM+ks dh ckr gqbZA ;gka rks ftldks tSlk [kkn ikuh feyrk gS og oSls gh isM+ mxkus yx tkrk gSA VkWi Dykl vf/kdkjh ls ysdj ekewyh ckcw rd vkt fHkUu&fHkUu izdkj ds iSlksa ds isM+ /kM+Yys ls mxkdj yk[kkas&djksM+ksa dek jgs gSA
      gka iSlks dk isM+ og ugh mxk ikrk ftldk yqPpbZ] yQaxbZ] eDdkjh] csbZekuh o jktuhfr ls nwj&nwj rd dk dksbZ okLrk ugha gSA iSlksa dk isM+ mlds ;gka Hkh ugha yxrk tks LokfHkeku] bZekunkjh] [kqn~nkjh ls thou thrk gSA ftlds fy, ns”kfgr] lektfgr gh lokZsifj gksrk gSA iSlks dk isM+ ogka Hkh ugha mxrk ftlds fy, iSlksa dk eryc [kwu&ilhus ls gksrk gS] ftlds fy, iSlksa dk eryc dke o ns”k ds fy, bZeku ls gksrk gSA rks ih-,e lkgc vki Hkh le> pqds gksaxs fd iSlksa dk isM+ dkSu mxk ldrk gS vkSj dkSu ughaA

                                                      vyadkj jLrksxh
448@733]ckck ckyd nkl    iqje Bkdqjxat] y[kuÅ
Ekks u-&9838565890

सोमवार, 17 सितंबर 2012

दान पात्र के बहाने...

किसी धार्मिक स्थान पर भले ही मूर्तियां छोटी हो अलबत्ता दान पात्रों को साईज इतना बड़ा होता है कि आप कन्फ्यूज हो जाते है कि यहां श्रद्धा से दान करे, सामथ्र्य से दान करे या फिर दान पात्र के साईज के हिसाब से दान करे। इस दान पात्र की महिमा इतनी निराली होती है कि कोई भी मन्दिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारा, अस्पताल, अनाथआलय, लंगर, भजन संध्या, रिलीफ कैंम्प यहां तक की राजनैतिक दलों के कार्यालय भी इसके बिना अधूरे से लगते है। इसकी महत्वता इसी बात से लगाई जा सकती है कि हर धार्मिक स्थल में ऊपर वाला भले ही दस कदम बाद मिले लेकिन हर एक कदम पर दान पात्र लटका जरूर मिल जाता है।
    छोटे से लेकर बडे तक हर तरीके के दान पात्रों का अस्तित्व पाया जाता है। भारी भरकम तालों से लैस यह दान पात्र अब पारदर्शी भी बनने लग गयें है। ताकि लोगों को इसमें पड़े दानों को देखकर उत्साहित, आकर्षित और  आमंत्रित किया जा सके। दान पात्रों के लगाने के स्थान के चयन पर विशेष मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है। मूर्तियों के ठीक नीचे या ऐसे स्थान के पास जहा थोड़ी देर के लिए विश्राम कर रहे हो तथा आपकों अपनी जेब टटोलने और पर्स खोलने का पर्याप्त समय मिल सके। दान पात्रों को इंगित करने के लिए बाकायदा तीर द्वारा निशान बनाकर आपको आसानी से उन तक पहुंचा दिया जाता हैंे। चलो धार्मिक स्थलों में दान पात्र अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर वहां की देखरेख आदि के लिए धन एकत्र करते हंै। लेकिन किसी पेड़ के नीचे एक मूर्ति रखकर कुछ अगर बत्तियां सुलगाकर दान पात्र लटका देना अच्छी पाचनशक्ति के बावजूद भी हजम करना असंभव सा लगता है।
चलो राहत कैंप, मेडिकल कैंप, भक्ति के कार्यक्रम छोड़ दीजिए यहां दान पात्रों का अस्तित्व समझ में आता है। लेकिन अब अन्ना जी के भ्रष्टाचार के विरोध में धरना प्रदर्शन के बाद से धरना स्थलों पर भी दान पात्र रखने की एक नई क्रांतिकारी परंपरा शुरू हो गयी है। अब तो बस लोगों ने इसी से प्रेरणा लेनी शुरू कर दी है। बिजली नहीं आ रही है, पानी नही आ रहा है तो दरी बिछाई, बैनर लगाया, बढ़ा सा दान पात्र लगाया और धरना शुरू कर दिया। अब भले ही उस धरने से बिजली पानी आए न आए उस धरना के धुरंधर का दान पात्र जरूर भर जाता हैं।      
     यह दान पात्र की ही महिमा है जिसने भूकंप के लिए, बाढ़ के लिए सूखे के लिए, कारगिल युद्ध के लिए अपना आर्थिक योगदान दिया था। अब यह दीगर  बात है कि इसी दान पात्र की बहती गंगा में न जाने कितने लोगों ने अपने नापाक हाथ धो डाले। अब तो कुछ लोग ऊपर वाले से यही मनाया करते हैं जल्दी-जल्दी भूकंप, बाढ़, सूनामी और युद्ध आदि होते रहे ताकि उनका दान पात्र भरा रहे। खैर अब इन लोगों को क्या कहा जाए यहां तो दान पात्रों को सदुपयोग करने से बढ़ी-बढ़ी राजनैतिक पार्टियां तक नहीं बच पा रही है। नेता का जन्म दिन हो तो दान पात्र लटक जाता है, पार्टी का स्थापना दिवस हो तो दान पात्र याद आ जाता है, चुनाव हो तो दान पात्र का साईज अनलिमिटेड हो जाता हैं। इनको छोड़िये यहां तो पाकिस्तान जैसा देश भी दान पात्र के सहारे ही जिंदा है। भले ही दान में मिले पैसो का इस्तेमाल वह अपने देष के विकास करने के बजाय आतंकवाद में कर रहा हो।

शनिवार, 15 सितंबर 2012

ब्रान्डेड बनाम जेनरिक नेता...


किसी धार्मिक स्थान पर भले ही मूर्तियां छोटी हो अलबत्ता दान पात्रों को साईज इतना बड़ा होता है कि आप कन्फ्यूज हो जाते है कि यहां श्रद्धा से दान करेए सामथ्र्य से दान करे या फिर दान पात्र के साईज के हिसाब से दान करे। इस दान पात्र की महिमा इतनी निराली होती है कि कोई भी मन्दिरए मस्जिदए चर्चए गुरूद्वाराए अस्पतालए अनाथआलयए लंगरए भजन संध्याए रिलीफ कैंम्प यहां तक की राजनैतिक दलों के कार्यालय भी इसके बिना अधूरे से लगते है। इसकी महत्वता इसी बात से लगाई जा सकती है कि हर धार्मिक स्थल में ऊपर वाला भले ही दस कदम बाद मिले लेकिन हर एक कदम पर दान पात्र लटका जरूर मिल जाता है।
    छोटे से लेकर बडे तक हर तरीके के दान पात्रों का अस्तित्व पाया जाता है। भारी भरकम तालों से लैस यह दान पात्र अब पारदर्शी भी बनने लग गयें है। ताकि लोगों को इसमें पड़े दानों को देखकर उत्साहितए आकर्षित और  आमंत्रित किया जा सके। दान पात्रों के लगाने के स्थान के चयन पर विशेष मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है। मूर्तियों के ठीक नीचे या ऐसे स्थान के पास जहा थोड़ी देर के लिए विश्राम कर रहे हो तथा आपकों अपनी जेब टटोलने और पर्स खोलने का पर्याप्त समय मिल सके। दान पात्रों को इंगित करने के लिए बाकायदा तीर द्वारा निशान बनाकर आपको आसानी से उन तक पहुंचा दिया जाता हैंे। चलो धार्मिक स्थलों में दान पात्र अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर वहां की देखरेख आदि के लिए धन एकत्र करते हंै। लेकिन किसी पेड़ के नीचे एक मूर्ति रखकर कुछ अगर बत्तियां सुलगाकर दान पात्र लटका देना अच्छी पाचनशक्ति के बावजूद भी हजम करना असंभव सा लगता है।
चलो राहत कैंपए मेडिकल कैंपए भक्ति के कार्यक्रम छोड़ दीजिए यहां दान पात्रों का अस्तित्व समझ में आता है। लेकिन अब अन्ना जी के भ्रष्टाचार के विरोध में धरना प्रदर्शन के बाद से धरना स्थलों पर भी दान पात्र रखने की एक नई क्रांतिकारी परंपरा शुरू हो गयी है। अब तो बस लोगों ने इसी से प्रेरणा लेनी शुरू कर दी है। बिजली नहीं आ रही हैए पानी नही आ रहा है तो दरी बिछाईए बैनर लगायाए बढ़ा सा दान पात्र लगाया और धरना शुरू कर दिया। अब भले ही उस धरने से बिजली पानी आए न आए उस धरना के धुरंधर का दान पात्र जरूर भर जाता हैं।      
     यह दान पात्र की ही महिमा है जिसने भूकंप के लिएए बाढ़ के लिए सूखे के लिए कारगिल युद्ध के लिए अपना आर्थिक योगदान दिया था। अब यह दीगर  बात है कि इसी दान पात्र की बहती गंगा में न जाने कितने लोगों ने अपने नापाक हाथ धो डाले। अब तो कुछ लोग ऊपर वाले से यही मनाया करते हैं जल्दी.जल्दी भूकंपए बाढ़ए सूनामी और युद्ध आदि होते रहे ताकि उनका दान पात्र भरा रहे। खैर अब इन लोगों को क्या कहा जाए यहां तो दान पात्रों को सदुपयोग करने से बढ़ी.बढ़ी राजनैतिक पार्टियां तक नहीं बच पा रही है। नेता का जन्म दिन हो तो दान पात्र लटक जाता हैए पार्टी का स्थापना दिवस हो तो दान पात्र याद आ जाता हैए चुनाव हो तो दान पात्र का साईज अनलिमिटेड हो जाता हैं। इनको छोड़िये यहां तो पाकिस्तान जैसा देश भी दान पात्र के सहारे ही जिंदा है। भले ही दान में मिले पैसो का इस्तेमाल वह अपने देष के विकास करने के बजाय आतंकवाद में कर रहा हो|