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गुरुवार, 25 जून 2015

आँखों की गुस्ताखियां





इस समय हमारे मोहल्ले की सारी तथाकथित बुलबुले साइलेंट मोड में आ लगी है। जीवन  के प्रति उनका सारा उत्साह वैसे ही नदारद हो गया है जेसे आडवाणी जी के लिए पीएम पद का। सजना-संवरना अब बीते जमाने की आडटडेटेड बाते हो चुकी है। ब्यूटी पार्लर जो किसी जमाने में उनका तीर्थ स्थान हुआ करता था, अब किसी कब्रिस्तान से कम नहीं लगता है। कुल मिलाकर जितनी भी छल्ले-उछाल टाईप्ड मोहतरमाएं थी वह सब एम टीवी से दूरदर्शन में कनवर्ट हो चुकी है। उनके जीवन में यह टर्निंग प्वाइंट अभी सरकार के उस हालियां निर्णय से हुआ है जिसमें किसी भी लड़की को घूरने पर गैर जमानती धारा लगाने का प्राविधान है। अब भला खुद बताइए जब लोगों को देखने तक से महरूम कर दिया जाएगा तो फिर क्या फायदा इस कातिलाना हुस्न का। अरे जब पीने वाले ही नहीं होंगें तो मयखाना सजाने का क्या फायदा। 
अब कैसे लड़कियां आपस में गाॅसिप करेगी कि कितने लड़को ने आज उन्हे मुड़-मुड़ कर स्वीट से लुक दिये। अरे जब कोई घूरेगा ही नही तो न अंखियां लड़ेगी, न अंखियां चार होगी और न अखियों में कोई समाएंगा। यानि कि कुल मिलाकर सरकार का यह निर्णय न जाने कितनी संभावनाओं, न जाने कितनी इच्छाओं, न जाने कितनी आशाओं पर सीधा सा कुठाराघात है। न जाने कितने ब्यूटी पार्लरो पर ताले लटकाने की शुरूआत है। न जाने कितनी शहनाज हुसैन गुमनामी की गर्त में समा जाने वाली है। न जाने कितनी फेयरनेस क्रीम अब खुद अंधकार की कालिमा में डूब जाने वाली हैं। अब तो इस कानून से दिल फेक टाईप्ड मोहतरमाएं ख्ुाद आश्चर्यचकित हैं कि उनके अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न क्यो लग गया है। 
इसका दूसरा पहलू भी है। कुछ झुकी निगाहों वाली, कुछ फ्राॅम घर टू स्कूल और स्कूल टू घर टाईप्ड बन्दियां, कुछ एंटी ब्यूटी पार्लर, कुछ बड़े बूढ़ो की लगाम लगी बन्दियां इस फरमान से खुश भी है कि न महफिल सजेगी न जश्न मनेगा। उधर हमारे जैसे सतयुग के कुछ विलुप्त प्राणियों के अवशेष जो वैसे ही मर्यादाओं की सारी टमर््स एंड कंडीशन्स को बखूबी फाॅलो करते है। उन्हे इस प्रस्तावित कानून से उसी प्रकार भय उत्पन्न हो रहा है जैसे बिना हेलमेट पहने गाड़ी चलाने वाले को चैराहे पर खड़े ट्रªैफिक हवलदार को देखकर होता है। हमने आज तक किसी को घूरना तो छोड़िये आंख तक उठाकर नही देखा। यह दूसरी बात कि कोई जब दिल को ज्यादा भा गया तोे उसे कनखियों से देख लिया। कभी-कभी तो हमें अपनी नजरे खुद झुकानी पड़ी जब किसी मृग नयनी ने अपनी तिरछी नजरों से हमें घूरकर देखा। अब तो हम इसी अंदेशे में जी रहे हैं कि कहीं कोई हमें ही न ताड़ ले और उल्टा तोहमत लगा दे कि हमने उसे घूरा। वैसे इस बात का क्या सबूत होगा कि उन्होंने हम पर नजर-ए-इनायत की या फिर हमने उनका दीदार किया। अब तो आंखो की गुस्ताखियां न हो इसके लिए हम रात में भी धूप का चश्मा लगाए फिरते हैं और अपनी आबरू को रूसवा होने से बचाते है।
    अलंकार रस्तोगी

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

मेरे देश की धरती सोना उगले

अब मनमोहन सरकार तो कुछ कर नहीं पायी ,चलिए शोभन सरकार ही देश का कुछ भला कर पाए . इस समय पूरा देश टकटकी लगाये बस यही जानने में लगा हुआ है कि शोभन सरकार का सपना सच हुआ या नहीं . धरती ने सोना उगला या नही पूरे देश के सपने आज यंही पर आकर एकसूत्रीय हो गए हैं . आज आम आदमी का रोटी ,कपडा और मकान वाला परंपरागत सपना राष्ट्रहित  में इसी राष्ट्रीय सपने में विलीन हो गया है .धरती में सोना है या नहीं का अभी तक का राष्ट्रीय और जल्दी ही अंतरराष्ट्रीय मुद्दा टॉप पर है तो कोयला घोटाला , सीमा पर घुसपैठ , आतंरिक सुरक्षा , स्वच्छ सरकार जैसे मुद्दे आउटडेटेड से लगने लगे हैं .
बताइए एक बाबा हकीकत के धन को देश में लाने की बात कहते कहते खुद सरकार की आँखों की करकिरी बन गए हैं .वहीँ दूसरे बाबा के उस सपने के धन को लाने के लिए सरकार इतनी उत्साहित हो गयी है कि आज वही स्वप्नदर्शी बाबा देश के संकट मोचक माने  जाने लगें हैं . खैर सपनो को हकीकत में बदलने का दावा तो हर सरकार करती है .हो सकता है यह कार्यक्रम भी उसी वादे की पूर्ति प्रक्रिया हो . सरकार के लिए वह धन जो स्विस बैंक में जमा है इस लिए भी निरर्थक हैं क्योंकि भले भले ही वह कला धन हो , कमाया तो मेहनत से ही गया है .अब बताइए घोटाले करो , मुकदमे झेलो , न जाने किन किन को मैनेज करो और जरा सा चूके तो बेचारे बन बुढ़ापे में जेल की हवा खाओ . ऐसा खून पसीने की कमाई से जमा किया धन पर्सनल सम्पदा होता है , लोग इसे बेवजह राष्ट्रीय सम्पदा बनाने का सपना संजोये हए हैं .
सरकार के लिए तो अब धरती का सोंना निकलना ही एक सूत्रीय राष्ट्रीय लक्ष्य हो चूका है . आखिर आम  जनता का सपना जो पूरा करना है . जनता भी सोने के लिए अपना सोंना हराम किये हुए है . देश अपनी समस्या का समाधान अपने कीमती वोट से चुनी हुई सरकार से करने की बजाये किसी बाबा के सपने में ढूंढ रहा है कि इधर धरती ने सोना उगला उधर देश फिर से सोने चिड़िया बन गया . वैसे भी जिस देश में मूर्तियाँ दूध पीने लगती हों, मुंहनुचवा जैसा वहम लोंगों की रातें खराब कर देता हो , वंहा अगर जमीन से सोना निकलने लगे तो हैरानी तो कतई नहीं होनी चाहिए . हाँ एक वास्तविकता यह है कि इस चक्कर में देश महगाई , भ्रष्टाचार  जैसे संवेदनशील  मुद्दे भुलाये दे रहा है .     

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

कद बढाने का शार्ट टर्म कोर्स

राम जाने कद बढाने के इन तथाकथित कोर्स में कौन सी ऐसी जड़ी – बूटी खिला दी जाती है जिससे मात्र ढाई महीने में किसी का कद इतना बढ़ जाता है कि वह बिपाशा टाइप्ड गर्ल फ्रेंड भी पा सकता है और जॉन अब्राहम का सिंहासन भी हिला सकता है . आम आदमी की इच्छा बस एक अदद गर्ल फ्रेंड की होती है या फिर मोहल्ले में छुटभैये टाइप की हिरोगिरी करने की होती है .न जाने कितनो के यह दबे अरमान कद ऊँचा न होने के कारण सरकारी ऑफिसों की फाइलों की तरह धूल खाया करतें हैं . इनके सामने अगर जिन्न भी आ जाये तो यह अपना कद ऊँचा करने की मुराद ही मानेंगे .क्यों की इधर कद ऊँचा हुआ उधर दो मुरादें वैसे ही पूरी हो जाएँगी .
खैर आम आदमी की मुरादों की लिस्ट में भले कद का ऊँचा होना महत्वपूर्ण की श्रेणी में आता होगा लेकिन  अगर हम देश के तथा कथित ख़ास प्राणियों यानी नेताओं की बात करें तो उनके लिए कद को बढ़ाने का फंडा कोई समय सीमा में कैद कोर्स नहीं बल्कि उनकी ताकत, हिमाकत, सियासत के दांव पेंच होता है .वह अपना कद बढ़ने के लिए किसी का भी कद छोटा कर सकते हैं भले ही उसे काट कर ही छोटा क्यों न किया जाय .वह अपने कद की ऊंचाई के लिय किसी भी निचाई तक जा सकतें है . उनके लिए पद का ऊँचा होना ऊँचे कद की निशानी हैं .वह अपने कद को ऊँचा करने के लिए साम ,दाम दंड ,भेद जैसे परंपरागत हथकंडे अजमाने में यकीन करतें हैं .
उनके लिए जातिवाद ,क्षेत्रवाद ,सम्प्रदायवाद ,भाषावाद ही वह जड़ी बूटियां हैं जिनका सेवन कर वह कद बढाने की समय सीमा को मिटा सकतें हैं .धर्म के नाम पर दंगा करा कर उसमे से निकले नफ़रत और जलन की भस्म को उन्माद के गरम घोल में मिलाकर पीने से महीनो में नहीं बल्कि उनका कद मिनटों में बढ़ जाता है .वह अपना कद बढाने के चक्कर में इतना खो जाते हैं कि उन्हें यह भी याद नहीं रहता है कि उनके अपने कब पराये हो गए .
एक जमाना था जब काम कर के कद ऊँचा किया जाता था आज दाम देकर किया जाता है .पहले त्याग ,बलिदान के आधार पर कद की ऊचाई तय होती थी आज स्वार्थ और महत्वाकांक्षा ही कद का पैमाना होता है . तब कद का बढ़ना एक समयबद्ध प्रक्रिया होती थी आज कद का बढ़ना एक स्वतंत्र प्रक्रिया है .आलाकमान को पटाओ ,विरोधियों को चित करो और अपनी छवि मार्केटिंग के जरिये दुनिया भर में बेच दो ,बढ़ गया मिनटों में आपका कद .

                                  अलंकार रस्तोगी 

सोमवार, 17 सितंबर 2012

दान पात्र के बहाने...

किसी धार्मिक स्थान पर भले ही मूर्तियां छोटी हो अलबत्ता दान पात्रों को साईज इतना बड़ा होता है कि आप कन्फ्यूज हो जाते है कि यहां श्रद्धा से दान करे, सामथ्र्य से दान करे या फिर दान पात्र के साईज के हिसाब से दान करे। इस दान पात्र की महिमा इतनी निराली होती है कि कोई भी मन्दिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारा, अस्पताल, अनाथआलय, लंगर, भजन संध्या, रिलीफ कैंम्प यहां तक की राजनैतिक दलों के कार्यालय भी इसके बिना अधूरे से लगते है। इसकी महत्वता इसी बात से लगाई जा सकती है कि हर धार्मिक स्थल में ऊपर वाला भले ही दस कदम बाद मिले लेकिन हर एक कदम पर दान पात्र लटका जरूर मिल जाता है।
    छोटे से लेकर बडे तक हर तरीके के दान पात्रों का अस्तित्व पाया जाता है। भारी भरकम तालों से लैस यह दान पात्र अब पारदर्शी भी बनने लग गयें है। ताकि लोगों को इसमें पड़े दानों को देखकर उत्साहित, आकर्षित और  आमंत्रित किया जा सके। दान पात्रों के लगाने के स्थान के चयन पर विशेष मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है। मूर्तियों के ठीक नीचे या ऐसे स्थान के पास जहा थोड़ी देर के लिए विश्राम कर रहे हो तथा आपकों अपनी जेब टटोलने और पर्स खोलने का पर्याप्त समय मिल सके। दान पात्रों को इंगित करने के लिए बाकायदा तीर द्वारा निशान बनाकर आपको आसानी से उन तक पहुंचा दिया जाता हैंे। चलो धार्मिक स्थलों में दान पात्र अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर वहां की देखरेख आदि के लिए धन एकत्र करते हंै। लेकिन किसी पेड़ के नीचे एक मूर्ति रखकर कुछ अगर बत्तियां सुलगाकर दान पात्र लटका देना अच्छी पाचनशक्ति के बावजूद भी हजम करना असंभव सा लगता है।
चलो राहत कैंप, मेडिकल कैंप, भक्ति के कार्यक्रम छोड़ दीजिए यहां दान पात्रों का अस्तित्व समझ में आता है। लेकिन अब अन्ना जी के भ्रष्टाचार के विरोध में धरना प्रदर्शन के बाद से धरना स्थलों पर भी दान पात्र रखने की एक नई क्रांतिकारी परंपरा शुरू हो गयी है। अब तो बस लोगों ने इसी से प्रेरणा लेनी शुरू कर दी है। बिजली नहीं आ रही है, पानी नही आ रहा है तो दरी बिछाई, बैनर लगाया, बढ़ा सा दान पात्र लगाया और धरना शुरू कर दिया। अब भले ही उस धरने से बिजली पानी आए न आए उस धरना के धुरंधर का दान पात्र जरूर भर जाता हैं।      
     यह दान पात्र की ही महिमा है जिसने भूकंप के लिए, बाढ़ के लिए सूखे के लिए, कारगिल युद्ध के लिए अपना आर्थिक योगदान दिया था। अब यह दीगर  बात है कि इसी दान पात्र की बहती गंगा में न जाने कितने लोगों ने अपने नापाक हाथ धो डाले। अब तो कुछ लोग ऊपर वाले से यही मनाया करते हैं जल्दी-जल्दी भूकंप, बाढ़, सूनामी और युद्ध आदि होते रहे ताकि उनका दान पात्र भरा रहे। खैर अब इन लोगों को क्या कहा जाए यहां तो दान पात्रों को सदुपयोग करने से बढ़ी-बढ़ी राजनैतिक पार्टियां तक नहीं बच पा रही है। नेता का जन्म दिन हो तो दान पात्र लटक जाता है, पार्टी का स्थापना दिवस हो तो दान पात्र याद आ जाता है, चुनाव हो तो दान पात्र का साईज अनलिमिटेड हो जाता हैं। इनको छोड़िये यहां तो पाकिस्तान जैसा देश भी दान पात्र के सहारे ही जिंदा है। भले ही दान में मिले पैसो का इस्तेमाल वह अपने देष के विकास करने के बजाय आतंकवाद में कर रहा हो।

शनिवार, 15 सितंबर 2012

ब्रान्डेड बनाम जेनरिक नेता...


किसी धार्मिक स्थान पर भले ही मूर्तियां छोटी हो अलबत्ता दान पात्रों को साईज इतना बड़ा होता है कि आप कन्फ्यूज हो जाते है कि यहां श्रद्धा से दान करेए सामथ्र्य से दान करे या फिर दान पात्र के साईज के हिसाब से दान करे। इस दान पात्र की महिमा इतनी निराली होती है कि कोई भी मन्दिरए मस्जिदए चर्चए गुरूद्वाराए अस्पतालए अनाथआलयए लंगरए भजन संध्याए रिलीफ कैंम्प यहां तक की राजनैतिक दलों के कार्यालय भी इसके बिना अधूरे से लगते है। इसकी महत्वता इसी बात से लगाई जा सकती है कि हर धार्मिक स्थल में ऊपर वाला भले ही दस कदम बाद मिले लेकिन हर एक कदम पर दान पात्र लटका जरूर मिल जाता है।
    छोटे से लेकर बडे तक हर तरीके के दान पात्रों का अस्तित्व पाया जाता है। भारी भरकम तालों से लैस यह दान पात्र अब पारदर्शी भी बनने लग गयें है। ताकि लोगों को इसमें पड़े दानों को देखकर उत्साहितए आकर्षित और  आमंत्रित किया जा सके। दान पात्रों के लगाने के स्थान के चयन पर विशेष मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है। मूर्तियों के ठीक नीचे या ऐसे स्थान के पास जहा थोड़ी देर के लिए विश्राम कर रहे हो तथा आपकों अपनी जेब टटोलने और पर्स खोलने का पर्याप्त समय मिल सके। दान पात्रों को इंगित करने के लिए बाकायदा तीर द्वारा निशान बनाकर आपको आसानी से उन तक पहुंचा दिया जाता हैंे। चलो धार्मिक स्थलों में दान पात्र अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर वहां की देखरेख आदि के लिए धन एकत्र करते हंै। लेकिन किसी पेड़ के नीचे एक मूर्ति रखकर कुछ अगर बत्तियां सुलगाकर दान पात्र लटका देना अच्छी पाचनशक्ति के बावजूद भी हजम करना असंभव सा लगता है।
चलो राहत कैंपए मेडिकल कैंपए भक्ति के कार्यक्रम छोड़ दीजिए यहां दान पात्रों का अस्तित्व समझ में आता है। लेकिन अब अन्ना जी के भ्रष्टाचार के विरोध में धरना प्रदर्शन के बाद से धरना स्थलों पर भी दान पात्र रखने की एक नई क्रांतिकारी परंपरा शुरू हो गयी है। अब तो बस लोगों ने इसी से प्रेरणा लेनी शुरू कर दी है। बिजली नहीं आ रही हैए पानी नही आ रहा है तो दरी बिछाईए बैनर लगायाए बढ़ा सा दान पात्र लगाया और धरना शुरू कर दिया। अब भले ही उस धरने से बिजली पानी आए न आए उस धरना के धुरंधर का दान पात्र जरूर भर जाता हैं।      
     यह दान पात्र की ही महिमा है जिसने भूकंप के लिएए बाढ़ के लिए सूखे के लिए कारगिल युद्ध के लिए अपना आर्थिक योगदान दिया था। अब यह दीगर  बात है कि इसी दान पात्र की बहती गंगा में न जाने कितने लोगों ने अपने नापाक हाथ धो डाले। अब तो कुछ लोग ऊपर वाले से यही मनाया करते हैं जल्दी.जल्दी भूकंपए बाढ़ए सूनामी और युद्ध आदि होते रहे ताकि उनका दान पात्र भरा रहे। खैर अब इन लोगों को क्या कहा जाए यहां तो दान पात्रों को सदुपयोग करने से बढ़ी.बढ़ी राजनैतिक पार्टियां तक नहीं बच पा रही है। नेता का जन्म दिन हो तो दान पात्र लटक जाता हैए पार्टी का स्थापना दिवस हो तो दान पात्र याद आ जाता हैए चुनाव हो तो दान पात्र का साईज अनलिमिटेड हो जाता हैं। इनको छोड़िये यहां तो पाकिस्तान जैसा देश भी दान पात्र के सहारे ही जिंदा है। भले ही दान में मिले पैसो का इस्तेमाल वह अपने देष के विकास करने के बजाय आतंकवाद में कर रहा हो|