किसी धार्मिक स्थान पर भले ही मूर्तियां छोटी हो अलबत्ता दान पात्रों को साईज इतना बड़ा होता है कि आप कन्फ्यूज हो जाते है कि यहां श्रद्धा से दान करे, सामथ्र्य से दान करे या फिर दान पात्र के साईज के हिसाब से दान करे। इस दान पात्र की महिमा इतनी निराली होती है कि कोई भी मन्दिर, मस्जिद, चर्च, गुरूद्वारा, अस्पताल, अनाथआलय, लंगर, भजन संध्या, रिलीफ कैंम्प यहां तक की राजनैतिक दलों के कार्यालय भी इसके बिना अधूरे से लगते है। इसकी महत्वता इसी बात से लगाई जा सकती है कि हर धार्मिक स्थल में ऊपर वाला भले ही दस कदम बाद मिले लेकिन हर एक कदम पर दान पात्र लटका जरूर मिल जाता है।
छोटे से लेकर बडे तक हर तरीके के दान पात्रों का अस्तित्व पाया जाता है। भारी भरकम तालों से लैस यह दान पात्र अब पारदर्शी भी बनने लग गयें है। ताकि लोगों को इसमें पड़े दानों को देखकर उत्साहित, आकर्षित और आमंत्रित किया जा सके। दान पात्रों के लगाने के स्थान के चयन पर विशेष मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है। मूर्तियों के ठीक नीचे या ऐसे स्थान के पास जहा थोड़ी देर के लिए विश्राम कर रहे हो तथा आपकों अपनी जेब टटोलने और पर्स खोलने का पर्याप्त समय मिल सके। दान पात्रों को इंगित करने के लिए बाकायदा तीर द्वारा निशान बनाकर आपको आसानी से उन तक पहुंचा दिया जाता हैंे। चलो धार्मिक स्थलों में दान पात्र अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर वहां की देखरेख आदि के लिए धन एकत्र करते हंै। लेकिन किसी पेड़ के नीचे एक मूर्ति रखकर कुछ अगर बत्तियां सुलगाकर दान पात्र लटका देना अच्छी पाचनशक्ति के बावजूद भी हजम करना असंभव सा लगता है।
चलो राहत कैंप, मेडिकल कैंप, भक्ति के कार्यक्रम छोड़ दीजिए यहां दान पात्रों का अस्तित्व समझ में आता है। लेकिन अब अन्ना जी के भ्रष्टाचार के विरोध में धरना प्रदर्शन के बाद से धरना स्थलों पर भी दान पात्र रखने की एक नई क्रांतिकारी परंपरा शुरू हो गयी है। अब तो बस लोगों ने इसी से प्रेरणा लेनी शुरू कर दी है। बिजली नहीं आ रही है, पानी नही आ रहा है तो दरी बिछाई, बैनर लगाया, बढ़ा सा दान पात्र लगाया और धरना शुरू कर दिया। अब भले ही उस धरने से बिजली पानी आए न आए उस धरना के धुरंधर का दान पात्र जरूर भर जाता हैं।
यह दान पात्र की ही महिमा है जिसने भूकंप के लिए, बाढ़ के लिए सूखे के लिए, कारगिल युद्ध के लिए अपना आर्थिक योगदान दिया था। अब यह दीगर बात है कि इसी दान पात्र की बहती गंगा में न जाने कितने लोगों ने अपने नापाक हाथ धो डाले। अब तो कुछ लोग ऊपर वाले से यही मनाया करते हैं जल्दी-जल्दी भूकंप, बाढ़, सूनामी और युद्ध आदि होते रहे ताकि उनका दान पात्र भरा रहे। खैर अब इन लोगों को क्या कहा जाए यहां तो दान पात्रों को सदुपयोग करने से बढ़ी-बढ़ी राजनैतिक पार्टियां तक नहीं बच पा रही है। नेता का जन्म दिन हो तो दान पात्र लटक जाता है, पार्टी का स्थापना दिवस हो तो दान पात्र याद आ जाता है, चुनाव हो तो दान पात्र का साईज अनलिमिटेड हो जाता हैं। इनको छोड़िये यहां तो पाकिस्तान जैसा देश भी दान पात्र के सहारे ही जिंदा है। भले ही दान में मिले पैसो का इस्तेमाल वह अपने देष के विकास करने के बजाय आतंकवाद में कर रहा हो।
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