सोमवार, 30 सितंबर 2013

एक मुट्ठी रेट की कीमत तुम क्या जानो ..

भारत जैसे प्रजातांत्रिक विवशता से जकड़े देश में एक मुट्ठी रेत की कीमत मात्र चंद रूपए नहीं होती। इस रेत के हर कण-कण में वह भगवान छिपा है जो नेता बनाता, सरकार बनाता है, मुख्यमंत्री बनाता है। यह रेत केवल जमीन से निकला पदार्थ नहीं है, इससे बनती है एक आलीशान इमारत जिसमें नेता, माफिया, अफसर, मंत्री जैसे खंभों का सहारा होता है। यह एक मुट्ठी रेत मात्र अवैध खनन का प्रतीक नहीं है, यह निशानी है एक ऐसे कुटुम्ब की जिसकी वसुधा में नोटों के पेड़ लगते हैं, जिसके अंदर वोटों के पहाड़ बनते हैं, अराजकता की खाने होती है, अत्याचार के पक्षी फड़फड़ाते हैं, अन्याय के फूल खिलते हैं, भ्रष्टाचार की नदिया बहती हैं और धृतराष्ट्रों का शासन होता है।
एक मुट्ठी रेत पकड़ने पर भले ही उंगलियों के पोरों से सरक जाए लेकिन जब उसे मशीनों और ट्रालियों से भरा जाता है तो हाथ की मुट्ठियाँ नोटों की गड्डियों से भर जाती हैं। शायद लोगों को यह भान हो चुका है कि रेत को मुट्ठी से उठाने का प्रयास व्यर्थ है। यह मुट्ठी तो विरोधियों का मुंह दबाने के काम में लाना कहीं अधिक हितकर है।  एक मुट्ठी अवैध रेत का एक वृहद दर्शन है। यह रोजगार है भले ही अवैध है। यह जनशक्ति का प्रतीक है भले ही वह जनशक्ति गुंडे या माफिया ही क्यों न हो। यह सत्ताधारी दल की प्रतिष्ठा का सवाल होता है भले ही सत्ता के पास किसी बात का कोई जवाब न हो। रेत का अवैध खनन मात्र रूपए बनाने की प्रक्रिया नहीं है। यह प्रजातंत्र के सहज वातावरण में आहूत किया जाने वाला राजसूय यज्ञ है जिसमें नेता और माफिया गठबंधन करके सांप्रदायिकता की अग्नि की आड़ में ईमानदार अफसरों की आहूति देते हैं। बेशर्मी का शंख बजाया जाता है और फिर सब मिलकर सत्ता की ताकत की आरती उतारने के बाद मनचाहा प्रसाद ग्रहण करते हैं।
सतयुग में ऋषियों के हवन को राक्षसगण दूषित करते थे और उनकी गुहार पर देवता राक्षसों का वध कर यज्ञ पूर्ण कराते थे। अब कलयुग है, यज्ञ का औचित्य बदल गया है। राक्षस स्वयं यज्ञ करते हैं। और जब कोई देवी उस अनैतिक और अवैध यज्ञ को रेाकने का प्रयास करती है तो उस पर सब आक्रामक हो जाते हैं। शायद कलयुग की यही परिणति है कि ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, कत्र्तव्यपरायणता आदि जैसे भाव एक मुट्ठी रेत की कीमत के आगे कहीं नहीं ठहरते हैं।
 
अलंकार रस्तोगी

बहस जारी है....

बहस जारी है....
देश के सबसे प्राइम चैनल के प्राइम टाइम पर हाल के सबसे प्राइम मुददे पर एक प्राइम बहस छिड़ी हुई थी। न्यूज एंकर रिपोर्टर कम फैशन जगत की पोस्टर ज्यादा लग रही थी, बहस में शामिल एक पुलिस अधिकारी से पूछती है-‘ इन दिनों जो रेप की घटनाएं बढ़ रहीं हैं उनमें पुलिस कितनी जिम्मेदार है?‘  पुलिस अधिकारी जिन पर फर्जी मुठभेड़ के कई मामले चल रहे थे, सीने को और चैड़ा करते हुए बोले-‘देखिए पुलिस अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाती है, अभी तक़़़ हम पर लोग रिश्वत देने के लिए उंगलियां उठाते थे कम से कम लोग यह तो जान गए हैं कि पुलिस रिश्वत देती भी है।‘ बहस के बैकग्राउंड में खबर चल रही थी ‘पांच साल की बच्ची के साथ बलात्कार‘।
‘तो मैडम आप का संगठन क्या कर रहा है?‘ सरकार के पैसों से हजारों-लांखों का फंड लेने वाले एन.जी.ओ की संचालिका जिनके आश्रम पर यौन शोषण का आरोप लगा था। अपना दामन संभाल कर बोली-‘ हमारे आश्रम में निराश्रित लड़कियां बिलकुल महफूज हैं। उन्हें आत्मरक्षा की टेनिंग भी दी जा रही है।‘ तभी एक विज्ञापन आता है जिसमें हाट ब्रांड्स के डियोडेन्ट्स लगाते ही लड़कियां चुंबक की तरह चिपकने लगती हैं। दस-पांच मिनट तक इसी प्रकार नारी सशक्तिकरण के बाद एंकर अगली बहस विपक्षी पार्टी के उन नेता जी से शुरू करती है जिनकी पार्टी में इस बार कम से कम आधा दर्जन बलात्कार के आरोपी संसद की शोभा बढ़ा रहे है।
 एकदम झक सफेद, दाग रहित कुर्ता पहने नेता जी आक्रोश की भंगिमा बनाकर कर बोले-‘हम तो कब से कह रहे है कि यह सरकार रेप के मामलां से निपटने में नाकाम रही है। हमारे कार्यकर्ता इस मुद्दे पर सरकार का संसद से सड़क तक विरोध कर रहे हे।‘ इस बार के ब्रेक में फिल्मों के प्रोमों आ रहे थे जो शीला की जवानी से शुरू होकर मुन्नी की बदनामी, चमेली की चिकनाहट और मिसकाॅल से लौंडिया के पटाने पर समाप्त हुए।
 सत्ताधारी पार्टी के नेता अपने तरकश से तीर निकालते हुए बोले-‘यह सब जनता के सामने हमारी इमेज खराब करने की विपक्षी साजिश है।‘ लेकिन आंकड़े तो यही बताते हैं कि रेप केस में दिनो दिन बढ़ोत्तरी हो रही है।.‘जी देखिए अपना प्रश्न फिर से दोहराएं मुझे कुछ सुनायी नहीं दे रहा है।‘ मैं यह कह रही थी...‘देखिए मुझे अब भी कुछ सुनायी नहीं दे रहा है।‘..‘लगता है कोई तकनीकी खराबी आ गयी हैं।‘ तभी ब्रेकिंग न्यूज आने लगी ..’’एक और गैंग रेप ..देश फिर शर्मशार‘’।
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-अलंकार रस्तोगी