भारत जैसे प्रजातांत्रिक विवशता से जकड़े देश में एक मुट्ठी रेत की कीमत मात्र चंद रूपए नहीं होती। इस रेत के हर कण-कण में वह भगवान छिपा है जो नेता बनाता, सरकार बनाता है, मुख्यमंत्री बनाता है। यह रेत केवल जमीन से निकला पदार्थ नहीं है, इससे बनती है एक आलीशान इमारत जिसमें नेता, माफिया, अफसर, मंत्री जैसे खंभों का सहारा होता है। यह एक मुट्ठी रेत मात्र अवैध खनन का प्रतीक नहीं है, यह निशानी है एक ऐसे कुटुम्ब की जिसकी वसुधा में नोटों के पेड़ लगते हैं, जिसके अंदर वोटों के पहाड़ बनते हैं, अराजकता की खाने होती है, अत्याचार के पक्षी फड़फड़ाते हैं, अन्याय के फूल खिलते हैं, भ्रष्टाचार की नदिया बहती हैं और धृतराष्ट्रों का शासन होता है।
एक मुट्ठी रेत पकड़ने पर भले ही उंगलियों के पोरों से सरक जाए लेकिन जब उसे मशीनों और ट्रालियों से भरा जाता है तो हाथ की मुट्ठियाँ नोटों की गड्डियों से भर जाती हैं। शायद लोगों को यह भान हो चुका है कि रेत को मुट्ठी से उठाने का प्रयास व्यर्थ है। यह मुट्ठी तो विरोधियों का मुंह दबाने के काम में लाना कहीं अधिक हितकर है। एक मुट्ठी अवैध रेत का एक वृहद दर्शन है। यह रोजगार है भले ही अवैध है। यह जनशक्ति का प्रतीक है भले ही वह जनशक्ति गुंडे या माफिया ही क्यों न हो। यह सत्ताधारी दल की प्रतिष्ठा का सवाल होता है भले ही सत्ता के पास किसी बात का कोई जवाब न हो। रेत का अवैध खनन मात्र रूपए बनाने की प्रक्रिया नहीं है। यह प्रजातंत्र के सहज वातावरण में आहूत किया जाने वाला राजसूय यज्ञ है जिसमें नेता और माफिया गठबंधन करके सांप्रदायिकता की अग्नि की आड़ में ईमानदार अफसरों की आहूति देते हैं। बेशर्मी का शंख बजाया जाता है और फिर सब मिलकर सत्ता की ताकत की आरती उतारने के बाद मनचाहा प्रसाद ग्रहण करते हैं।
सतयुग में ऋषियों के हवन को राक्षसगण दूषित करते थे और उनकी गुहार पर देवता राक्षसों का वध कर यज्ञ पूर्ण कराते थे। अब कलयुग है, यज्ञ का औचित्य बदल गया है। राक्षस स्वयं यज्ञ करते हैं। और जब कोई देवी उस अनैतिक और अवैध यज्ञ को रेाकने का प्रयास करती है तो उस पर सब आक्रामक हो जाते हैं। शायद कलयुग की यही परिणति है कि ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, कत्र्तव्यपरायणता आदि जैसे भाव एक मुट्ठी रेत की कीमत के आगे कहीं नहीं ठहरते हैं।
अलंकार रस्तोगी
एक मुट्ठी रेत पकड़ने पर भले ही उंगलियों के पोरों से सरक जाए लेकिन जब उसे मशीनों और ट्रालियों से भरा जाता है तो हाथ की मुट्ठियाँ नोटों की गड्डियों से भर जाती हैं। शायद लोगों को यह भान हो चुका है कि रेत को मुट्ठी से उठाने का प्रयास व्यर्थ है। यह मुट्ठी तो विरोधियों का मुंह दबाने के काम में लाना कहीं अधिक हितकर है। एक मुट्ठी अवैध रेत का एक वृहद दर्शन है। यह रोजगार है भले ही अवैध है। यह जनशक्ति का प्रतीक है भले ही वह जनशक्ति गुंडे या माफिया ही क्यों न हो। यह सत्ताधारी दल की प्रतिष्ठा का सवाल होता है भले ही सत्ता के पास किसी बात का कोई जवाब न हो। रेत का अवैध खनन मात्र रूपए बनाने की प्रक्रिया नहीं है। यह प्रजातंत्र के सहज वातावरण में आहूत किया जाने वाला राजसूय यज्ञ है जिसमें नेता और माफिया गठबंधन करके सांप्रदायिकता की अग्नि की आड़ में ईमानदार अफसरों की आहूति देते हैं। बेशर्मी का शंख बजाया जाता है और फिर सब मिलकर सत्ता की ताकत की आरती उतारने के बाद मनचाहा प्रसाद ग्रहण करते हैं।
सतयुग में ऋषियों के हवन को राक्षसगण दूषित करते थे और उनकी गुहार पर देवता राक्षसों का वध कर यज्ञ पूर्ण कराते थे। अब कलयुग है, यज्ञ का औचित्य बदल गया है। राक्षस स्वयं यज्ञ करते हैं। और जब कोई देवी उस अनैतिक और अवैध यज्ञ को रेाकने का प्रयास करती है तो उस पर सब आक्रामक हो जाते हैं। शायद कलयुग की यही परिणति है कि ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, कत्र्तव्यपरायणता आदि जैसे भाव एक मुट्ठी रेत की कीमत के आगे कहीं नहीं ठहरते हैं।
अलंकार रस्तोगी
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