एक हत्या होती है मरने वाला गरीबी की सीमा के नीचे का होता है और मारने वाले की अमीरी की कोई सीमा नहीं होती है. शव के सड़ने की सीमा के पहले ही पुलिस अपनी औपचारिकता की सीमा को बनाए रखने के लिए आ पहुंचती है. फिर इस थाने की पुलिस दूसरे थाने की पुलिस को उसकी सीमा याद दिलाती है। फिर सीमा विवाद प्रारंभ हो जाता है। एक सीमा विवाद हमारे मोहल्ले में भी हुआ लेकिन यहां हर कोई उस सीमा विवाद में पड़ना चाहता था। असल में हमारे मोहल्ले में सीमा नाम की एक लड़की हुआ करती थी। एक तो वह दिल फेक थी दूसरे नाक-नक्श भी माशा अल्लाह कातिलाना थे। सो इस सीमा ने तो पूरे मोहल्ले ने इतने विवाद करा रखे थे कि पूरे मोहल्ला ही सीमा विवाद के नाम से जाना जाने लगा था। यह तो करम था ऊपर वाले का कि सीमा अपनी सीमा पार करने से पहले ही ससुराल की सीमा पार कर गयी नही तो हमारे जज़्बातों की सीमा भी कभी न कभी पार हो ही जाती।
उधर चीन भी कई बार हमारी सीमां लांघने की कोशिश कर चुका है। लेकिन हर बार हमारे बहादुर सैनिकों की वीरता उन्हे उनकी सीमा याद दिला देती है। पर हमारे नेताओं की धैर्य की सीमा कभी पार नहीं होती। कुछ सीमाएं तो ऐसी होती है जो विवादो में कैद हो जाती है। पर यदि कोई विवाद कोर्ट की सीमा में चला जाएं तो वह कभी भी सीमा में कैद नहीं हो सकता। कभी वादी, विवाद की सीमा बढ़ता है तो कभी प्रतिवादी। किसी तरह एक कोर्ट की सीमा समाप्त होती है तो दूसरे कोर्ट की सीमा में अपील हो जाती है। पता चलता है कि इस दौरान बेचारे वादी की धीरज नही तो उम्र की सीमा आवश्य समाप्त हो जाती है।
सीमा विवाद हो या विवादो की सीमा, हमारे नेताओ के लिए यह कभी भी किसी परेशानी की सीमा न बन सकी। उनकी सीमाएं इतनी फैली हुई होती है कि सारी सीमाएं उनके प्रभाव से बन भी जाती है और मिट भी जाती है। उनके लिए दूसरे दलों की सीमाएं अपने लिए खोलना हो, और अपने दल की सीमा में दूसरे दलों को लाना हो, चुनाव से पहले अपनो वादो की सीमा पार कर जाना हो, चुनाव जीत जाने के बाद अपने क्षेत्र की सीमा भूल जाना हो या मंत्री बन जाने पर भ्रष्टाचार की सीमा और सत्ता के बुखार की सीमा आदि आदि सीमाए उनके समक्ष विवश हो जाती है और भारतीय जनता प्रजातंत्र की विवशता की सीमा में जकड़कर रह जाती है।
अलंकार रस्तोगी
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें