रविवार, 6 अक्टूबर 2013

न बाबा न

इस घोर कलयुग में परम सतयुगी बाबाओं के चरम पर चल रहे बेशरम कामों की गरम शामों को देखकर अब अपना भी पापी मन इस कलम घिस प्रोफेशन को अलविदा कर बाबागीरी में कूदने को कुलबुला रहा है। यहां तो हम चाहे जितनी कलम घिस दें या फिर अपना इकलौता सिर ही कलम कर दें रहेंगे फिर भी बेचारे तथाकथित लेखक ही। सौभाग्य से हमारे पास बाबागीरी के सारे मूलभूत तत्व भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। बोलने की कला यानि वोकल आर्ट में अपना चार्ट तो वैसे ही काफी ऊपर रहा है। कामर्स से लेकर काम-रस तक, पाप-पुन्य से लेकर पालिटिक्स तक अपनी महारत सबमें हासिल है। इन टापिक्स पर धारा प्रवाह बोलने की गवाह तो वैसे ही हमारे मोहल्ले की सारी पब्लिक रही है। अब अपनी वाणी से साधकों को लायल और दुनिया को कायल बनाने के लिए अब महज किसी धार्मिक चैनल के प्राइम टाइम स्लाट पर बैकग्राउण्ड म्यूज़िक और साउण्ड इफेक्ट्स के साथ एक धाँसू परफारमेन्स का सहारा लेना बाकी रह जाता है।
किसी ने खूब कहा है कि ‘‘जो होता है अच्छा होता है’’। अब अपना भूतकाल जो हमें अभी तक भूत की तरह डराया करता था। रेप, मर्डर, चोरी, डकैती कर फालतू में हम भागे-भागे घूमते थे। बाबागीरी कर हमें इन पापों के प्रायश्चित का अवसर भी प्राप्त होगा और अपने अनुभवों से हम जनता को हम इन दुश्कर्म के मर्म से परिचित भी करा सकेंगे और फिर बाबागीरी के साथ अपना यह साइड बिजनेस भी आराम से कर सकेंगे। अभी तक हमने अपने मोहल्ले के महज दो चार प्लाट ही कब्जियाये हैं। इस बाबागीरी से एक फायदा यह भी हो जायेगा कि अपनी जो तमन्ना देशभर में मैदान से लेकर हिल स्टेशन तक प्रापर्टी बनाने की थी वह भी पूरी हो जायेगी। आश्रम की आड़ में दस-पन्द्रह हजार एकड़ जमीन तो आराम से अपने बाप की हो जायेगी। जिस डांस के कीड़े को शान्त करने के लिए हमें अपने यारों-दोस्तों की बारातो का सहारा लेना पड़ता था अब कम से कम अपने साधकों-साधिकाओं के साथ इस शौक को रोज के रोज पूरा तो कर सकेंगे। ईश्वर भक्ति तो होगी ही, तन और मन की शक्ति भी मिल जायेगी। जिस होली को खेलने के लिए हमने न जाने कहाँ-कहाँ की भाभियाँ अरेन्ज करनी पडती थीं अब बाबागीरी के बाद न जाने कितने लोग हमसे होली खेलने को खुद तरसेंगे। एक तरफ हमारे हाथ में हाईप्रेशर पिचकारी और दूसरी तरफ होली खेलने के लिए तड़पती पब्लिक। इस चार्म के वार्म की कल्पना आप भी कर सकते हैं।
इस समय अपनी लोकप्रियता का ग्राफ बड़ों-बड़ो को साफ करता चला जा रहा है। अपनी इस लोकप्रियता और बढ़ती हुयी ऐश को अपनी अगली सात पुश्तों के लिए कैश करने को अब हम कई तथाकथित देश भक्त टाईप की राजनीतिक पार्टियों के सम्पर्क में है। ईश्वर ने चाहा तो आपको प्रजातान्त्रिक विवशता के विकल्प के रूप में हम जल्दी ही उपलब्ध हो जायेंगे। अभी तक तो हम आपका लोक और और परलोक ही सुधारने का दावा करते थे अब हम इससे अपना भी लोक और परलोक सुधार सकेंगे। 
अपनी बाबागीरी थोड़ी लेटेस्ट और हाईटेक टाइप की होगी। अपने सारे प्रवचन हमारे ब्लाग पर उपलब्ध होंगे, ट्वीटर पर हमें फालो किया जा सकेगा और फेसबुक पर भी आप हमारा फेस देख सकेंगे। हमारे आर्शीवाद और प्रसाद वेबसाईट पर आनलाइन होंगे और आप अपने डोनेशन थ्रू बाबाजी डाट काम भेज सकेंगे। हम अपने कार्यक्रम पैसे देकर लगभग सारे न्यूज चैनलों में दिखाया करेंगे ताकि हम पर किसी को न्यूज बनाने का मोका ही न मिले। हम भक्तो को समाधान भी नये तरीके से देगें। पूड़ी बांटने से कैंसर से मुक्ति मिलेगी तो, पेन्सिल बांटने से सरकारी नौकरी मिलेगी, काला पर्स रखने से पैसा बढ़ेगा। हां! इस बाबागिरी के चक्कर में हमें अपने चिकने-चुपड़े चेहरे पर झाड़ीरूपी दाढ़ी जरूर उगानी पड़ेगी। जीन्स टी-शर्ट के अलावा हमने कुछ छूकर नहीं देखा अब उसी गेटप को बसंती चोले में कन्वर्ट करना पड़ेगा। खैर बहुत कुछ पाने के लिए कुछ-कुछ तो खोना पड़ेगा ही। 

            अलंकार रस्तोगी

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