बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

बापू की आत्मा का औचक निरीक्षण

बापू की आत्मा ने इस बार अपने जन्मदिन पर देश की नब्ज टटोलने की सोंची। सबसे पहले उनकी आत्मा सरकारी आफिस में गयी। वहां उन्होंने देखा कि उनकी फोटों पर फूल-मालाए चढ़ाई जा रही है। देश भक्ति के नारों से माहौल वाकई फीलगुड कराने जैसा लगा। तभी उनकी आत्मा को जोर का झटका धीरे से लगा। सभा के खतम होते हीं मेज के नीचे से, अल्मारी की आड़ में हर तरफ बापू ही छाये हुए थे। लेकिन वह बापू जी विचारों में नहीं बल्कि रिश्वत में दी गयी और ली गयी नोटों के ऊपर फोटों के रूप में थे।
खैर उनकी आत्मा कुपित होने के बाद भी अपना ढांढस बंधाते हुए उनके द्वारा दी गयी आजादी का हाल-चाल लेने निकल पड़ी। पता चला यहां तो नेताओं को घोटाला करने की पूरी आजादी है। ठेकेदारों को दवा से लेकर दारू तक में मिलावट की फुल फ्रीडम है। नेता सरकार में आते ही कानून के बंधन से पूरी तरह आजाद हो जाते है। अब बापू की आत्मा अपने धैर्य को किसी तरह संभालते हुए आगे बढ़ चली। तभी एकाएक उन्होंने सेाचा कि उनके पास एक लाठी हुआ करती थी देखते हैं आज वह कितनों का सहारा बनी हुई है। पता चला आज वह जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला काम कर रही है। अब लाठी किसी मजबूर का नहीं बल्कि हर मजबूत का सहारा बन गयी है। जिसको देखों वही अपनी लाठी हांक कर मतदाता को भयभीत कर प्रजातंत्र का भाग्य विधाता बना हुआ है। 
हिंसा को देख बापू की आत्मा आगे बढ़ गयी। तभी उन्हें याद आया कि उनके पास गीता भी हुआ करती थी। वह गीता अवश्य ही लोगों को कर्म का मर्म बात रही होगी। बहुत ढूंढने पर गीता बापू को अदालत में मिली। वही गीता जो कभी उन्हें सत्य के मार्ग पर  आगे बढ़ने को प्रेरित करती थी आज वही गीता लोग झूठी कसमें खाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। बापू कुपित हुए और आगे बढ़ लिए। मन में उस घड़ी का भी हाल पता करने का ख्याल आया जो उन्हें समय का पाबंद बनाती थी। लेकिन यह क्या आज हर आदमी घड़ी से ज्यादा अपनी साहूलियत को ताबज्जो देता मिला। कर्मचारियों की घड़ी आॅफिस की घड़ी से एक घंटा लेट ही मिली। अपने खून पसीने से दी गयी आजादी, लोगों का संभल लाठी, पथप्रदर्शक गीता, समय की कीमत बताती घड़ी की यह दुर्दशा देख बापू की आत्मा को अपने तीन बंदरों से ही आशा बची थी। पता चला बापू का वह बंदर जो आंखें बंदकर बुरा न देखने की सीख देता था वह अब कानून बन चुका है जिसे सबूतों के अलावा कुछ नहीं दिखायी देता है। कान बंद कर बुरा न सुनो कहने वाला बंदर अब प्रशासन बन गया है जो किसी की नहीं सुन रहा है। लेकिन बापू की आत्मा को सबसे बड़ा कष्ट जब पहुचा जब उन्हें पता चला कि मुंह पर हाथ ढक कर बुरा न बोलों वाला संदेश देने वाला बंदर अब देश का प्रधानमंत्री बन  चुका है। जो किसी भी मुद्दे पर कुछ नहीं बोलता है।                              
                                   अलंकार रस्तोगी  

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