गरमागरम भाप निकालती हुई खिचड़ी को आपने दही, पापड़, घी और आचार के साथ खाने के अलावा कभी समझने की कोशिश की है? अरे भाई खिचड़ी सिर्फ भोजन ही नहीं होती बल्कि इसके पीछे एक अच्छी-खासी फिलासफी भी छुपी होती है। जो जाने-अनजाने हम भारतीयों को प्रेरित भी करती रहती है। हमारे भारतीय समाज को ही ले लीजिए, पूरी तड़का मार खिचड़ी का स्वाद देता है। विभिन्न धर्म रूपी दालें, बोलियां रूपी मसाले, संस्कृति रूपी चावल और फिर जब उसमें एकता रूपी तड़का लगाया जाता है तो फिर कहना ही क्या इस सारे जहां से अच्छी खिचड़ी के। हाँ, कभी-कभी यह खिचड़ी जल जरूर जाती है जब इसे साम्प्रदायिकता रूपी भट्ठी पर चढा दिया जाता है। हमारे देश में तो इसी खिचड़ी से प्रेरित होकर सरकारें तक बनती चली आ रही हैं। यकीन न हो तो इसकी सामग्री आप भी नोट कर लीजिए। छोटे-मोटे राजनीतिक दलों रूपी दालें और निर्दलीय रूपी मसाले, दल-बदलू स्वादानुसार उनको मंत्री पद रूपी कूकर और सुविधाओं रूपी आँच में पका लीजिए और फिर तैयार हो जाती है एन0डी0ए0 या यू0पी0ए0 रूपी खिचड़ी। जितना मन चाहे खाओ और मजबूर जनता को भी न चाहते हुए पांच सालों तक झिलाओ।
अब बताइये अपने देश में त्योहारों की कोई कमी है, यहां त्यौहार ऐसे भरे पड़े हैं जैसे सुनील शेट्टी के शरीर में बाल। ऐसे में हमारी हर दिल अजीज खिचड़ी के लिए भी बाकायदा एक अच्छा खासा त्यौहार बना हुआ है। भला खिचड़ी की महिमा को साबित करने के लिए इससे बड़ा और सबूत क्या हो सकता है। अगर देखा जाए तो न्यूमरोलाॅजी के हिसाब से भी अपनी खिचड़ी का ‘के’ लेटर बिल्कुल सटीक है। तभी तो अगलों ने इस नाम का सीरियल तक बना डाला था। यह इसका बड़प्पन ही तो है नहीं तो ‘के’ अक्षर वाले नामों का अकाल थोड़े ही पड़ गया था। कीमा, कोरबा, कवाब, कटलेट और खीर भी तो बचे थे।
अगर खिचड़ी को खिचड़ी ही मानकर चलें तब भी संजीव कपूर तक की डिश भी इस टक्कर नहीं दे सकती। खिचड़ी बनाने में जितना कम समय लगता है उतना तो दूसरे खानों की तैयारी में ही लग जाता है। चट मंगनी और पट ब्याह की तरह इधर चढाया और उधर खाया। बरतन भी कम लगते हैं, न कटोरी न चम्मच, न छुरी न कांटा। पौष्टिकता में भी खिचड़ी किसी से कम नहीं। दालों में भरपूर प्रोटीन जो होता है। कोई बीमार होता है तो भी बेचारा खिचड़ी के सहारे ही नैया पार लगाता है। मोटे लोग भी डाइटिंग में खिचड़ी के भरोसे ही स्लिम-ट्रिम फिगर पा लेते हैं। क्या खिचड़ी पक रही है? काफी सटीक मुहावरा है, सरकार गिराने वालों पर और लड़के-लड़की के साथ होने पर एकदम फिट बैठता है। बीरबल की खिचड़ी वाला मुहावरा तो सुना ही होगा आपने। बताइये बीरबल जैसे बुद्धिमान तक को भी खिचड़ी का ही सहारा लेना पड़ा। वैसे खिचड़़ी पकाना और खाना जितना सरल है उतनी ही सरल इसकी फिलासफी भी है। खिचड़ी प्रतीक होती है एकता की, मेल-जोल की, सादगी की, ताकत की और शीघ्रता की। बस जरूरत इस बात की है कि आज आदमी सिर्फ खिचड़ी की फिलासफी को ही समझ लो तो शायद यह देश भी ताजी खिचड़ी की तरह सुगन्ध देने लगे।
अलंकार रस्तोगी
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