मंगलवार, 23 जून 2015

मानवीय आधार या माननीय आधार

मानवीय नहीं ,माननीय आधार
इन दिनों जब से मानवीय आधार पर किये गए सारे कार्य प्रश्न चिन्हों से परे हो गए हैं तब से लोगों ने अचानक हर कार्य का आधार मानवीय आधार को ही बना लिया है . अब तो हालत यहाँ तक आ गई है कि लोग  सरकार से आधार कार्ड से ज्यादा एक अदद मानवीय आधार कार्ड बनवाने की अपील करने लगे हैं . वैसे तो हर वह बंदा जो किसी पार्टी की सरकार बनवाने में मदद करता है उसे सरकार बनने के बाद ऑटोमेटिक मानवीय आधार का कोटा एलोट हो जाता है . यानी मानवीय आधार से डूबा प्यार पाने का वह हर बंदा स्वाभाविक रूप से हकदार हो जाता है जो सत्ता के यें- केन- प्रकारेण नज़दीक रहा हो . शायद बहुत ही पहले जमाने की बात रही होगी जब मानवीय आधार का हकदार वाकई समाज का दबा –कुचला और ज़रूरतमंद वर्ग रहा होता होगा क्योंकि जबसे हमने होश संभाला है तब से तो मानवीय आधार कार्ड किसी न किसी माननीय के पते पर ही पहुँच रहा है . हर शोषित को जहाँ किसी मदद के लिए सुविधा शुल्क का आधार लेना पड़ता हो वहीँ इस देश के माननीयों को यह मानवीय आधार ब्रांड वाली सुविधा अपनी प्रीपेड सेवाओं के एवज में आसानी से मिलती दिख जाती है .
       अब यह नयी बात नहीं रह गयी कि सत्ताधारी दल किसी की नियमों को ताक पर रखकर मदद करे . लेकिन अगर हर गलत मदद करने का आशय मानवीय आधार बता दिया जाये तो शायद यह पवित्र शब्द भी प्रश्न चिन्ह के दायरे में जायेगा . अब तो बाबा भारती की वह कहानी याद आती है जब एक डाकू ने मदद लेने के बहाने धोखे से उनसे उनका घोड़ा हथिया लिया था . तब बाबा भारती ने कहा था कि किसी को यह नहीं बताना कि तुमने याह घोड़ा कैसे छल से प्राप्त किया था वरना कोई किसी कि मदद नहीं करेगा लोगों का मानवता से भरोसा उठ जायेगा . ठीक यही अब हो रहा है मानवीय आधार देकर ऐसे बन्दे की मदद की जा रही है जो कानूनी रूप से गलत है  . समझ में यह नहीं आता है कि मानवीय आधार पर किसी को पैरोल मिल जाती है , किसी को बेल मिल जाती है और किसी को वीजा भी मिल जाता है लेकिन रोज़ के रोज़ आत्महत्या करने वाले किसानो को बचाने का किसी को कोई मानवीय आधार नहीं मिल पाता है . अब देखना है कि जब सरकार चलाने का आधार कानूनी से मानवीय हो जाता है तब इस आधार की मांग सरकार कहाँ तक पूरी कर पाती है .       
अलंकार रस्तोगी
448\733 बाबा बालक दस पुरम ,

ठाकुर गंज ,लखनऊ -3

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