अब मनमोहन सरकार तो कुछ कर नहीं पायी ,चलिए
शोभन सरकार ही देश का कुछ भला कर पाए . इस समय पूरा देश टकटकी लगाये बस यही जानने
में लगा हुआ है कि शोभन सरकार का सपना सच हुआ या नहीं . धरती ने सोना उगला या नही
पूरे देश के सपने आज यंही पर आकर एकसूत्रीय हो गए हैं . आज आम आदमी का रोटी ,कपडा
और मकान वाला परंपरागत सपना राष्ट्रहित
में इसी राष्ट्रीय सपने में विलीन हो गया है .धरती में सोना है या नहीं का
अभी तक का राष्ट्रीय और जल्दी ही अंतरराष्ट्रीय मुद्दा टॉप पर है तो कोयला घोटाला , सीमा
पर घुसपैठ , आतंरिक सुरक्षा , स्वच्छ सरकार
जैसे मुद्दे आउटडेटेड से लगने लगे हैं .
बताइए एक बाबा हकीकत के धन को देश में
लाने की बात कहते कहते खुद सरकार की आँखों की करकिरी बन गए हैं .वहीँ दूसरे बाबा
के उस सपने के धन को लाने के लिए सरकार इतनी उत्साहित हो गयी है कि आज वही
स्वप्नदर्शी बाबा देश के संकट मोचक माने
जाने लगें हैं . खैर सपनो को हकीकत में बदलने का दावा तो हर सरकार करती है
.हो सकता है यह कार्यक्रम भी उसी वादे की पूर्ति प्रक्रिया हो . सरकार के लिए वह
धन जो स्विस बैंक में जमा है इस लिए भी निरर्थक हैं क्योंकि भले भले ही वह कला धन
हो , कमाया तो मेहनत से ही गया है .अब बताइए घोटाले करो , मुकदमे
झेलो , न जाने किन किन को मैनेज करो और जरा सा चूके तो ‘बेचारे
‘ बन बुढ़ापे में जेल की हवा खाओ . ऐसा खून पसीने की कमाई से जमा किया
धन पर्सनल सम्पदा होता है , लोग इसे बेवजह राष्ट्रीय सम्पदा बनाने
का सपना संजोये हए हैं .
सरकार के लिए तो अब धरती का सोंना निकलना
ही एक सूत्रीय राष्ट्रीय लक्ष्य हो चूका है . आखिर आम जनता का सपना जो पूरा करना है . जनता भी सोने
के लिए अपना सोंना हराम किये हुए है . देश अपनी समस्या का समाधान अपने कीमती वोट
से चुनी हुई सरकार से करने की बजाये किसी बाबा के सपने में ढूंढ रहा है कि इधर
धरती ने सोना उगला उधर देश फिर से सोने चिड़िया बन गया . वैसे भी जिस देश में
मूर्तियाँ दूध पीने लगती हों, मुंहनुचवा जैसा वहम लोंगों की रातें
खराब कर देता हो , वंहा अगर जमीन से सोना निकलने लगे तो हैरानी तो
कतई नहीं होनी चाहिए . हाँ एक वास्तविकता यह है कि इस चक्कर में देश महगाई , भ्रष्टाचार जैसे संवेदनशील मुद्दे भुलाये दे रहा है .