रविवार, 27 अक्टूबर 2013

मेरे देश की धरती सोना उगले

अब मनमोहन सरकार तो कुछ कर नहीं पायी ,चलिए शोभन सरकार ही देश का कुछ भला कर पाए . इस समय पूरा देश टकटकी लगाये बस यही जानने में लगा हुआ है कि शोभन सरकार का सपना सच हुआ या नहीं . धरती ने सोना उगला या नही पूरे देश के सपने आज यंही पर आकर एकसूत्रीय हो गए हैं . आज आम आदमी का रोटी ,कपडा और मकान वाला परंपरागत सपना राष्ट्रहित  में इसी राष्ट्रीय सपने में विलीन हो गया है .धरती में सोना है या नहीं का अभी तक का राष्ट्रीय और जल्दी ही अंतरराष्ट्रीय मुद्दा टॉप पर है तो कोयला घोटाला , सीमा पर घुसपैठ , आतंरिक सुरक्षा , स्वच्छ सरकार जैसे मुद्दे आउटडेटेड से लगने लगे हैं .
बताइए एक बाबा हकीकत के धन को देश में लाने की बात कहते कहते खुद सरकार की आँखों की करकिरी बन गए हैं .वहीँ दूसरे बाबा के उस सपने के धन को लाने के लिए सरकार इतनी उत्साहित हो गयी है कि आज वही स्वप्नदर्शी बाबा देश के संकट मोचक माने  जाने लगें हैं . खैर सपनो को हकीकत में बदलने का दावा तो हर सरकार करती है .हो सकता है यह कार्यक्रम भी उसी वादे की पूर्ति प्रक्रिया हो . सरकार के लिए वह धन जो स्विस बैंक में जमा है इस लिए भी निरर्थक हैं क्योंकि भले भले ही वह कला धन हो , कमाया तो मेहनत से ही गया है .अब बताइए घोटाले करो , मुकदमे झेलो , न जाने किन किन को मैनेज करो और जरा सा चूके तो बेचारे बन बुढ़ापे में जेल की हवा खाओ . ऐसा खून पसीने की कमाई से जमा किया धन पर्सनल सम्पदा होता है , लोग इसे बेवजह राष्ट्रीय सम्पदा बनाने का सपना संजोये हए हैं .
सरकार के लिए तो अब धरती का सोंना निकलना ही एक सूत्रीय राष्ट्रीय लक्ष्य हो चूका है . आखिर आम  जनता का सपना जो पूरा करना है . जनता भी सोने के लिए अपना सोंना हराम किये हुए है . देश अपनी समस्या का समाधान अपने कीमती वोट से चुनी हुई सरकार से करने की बजाये किसी बाबा के सपने में ढूंढ रहा है कि इधर धरती ने सोना उगला उधर देश फिर से सोने चिड़िया बन गया . वैसे भी जिस देश में मूर्तियाँ दूध पीने लगती हों, मुंहनुचवा जैसा वहम लोंगों की रातें खराब कर देता हो , वंहा अगर जमीन से सोना निकलने लगे तो हैरानी तो कतई नहीं होनी चाहिए . हाँ एक वास्तविकता यह है कि इस चक्कर में देश महगाई , भ्रष्टाचार  जैसे संवेदनशील  मुद्दे भुलाये दे रहा है .     

शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013

इनके बोल बड़े अनमोल

शर्मा जी पिछले बीस मिनट से टी0वी0 के बीस कामर्शियल बे्रक्स के इमोशनल अत्याचार को झेलते हुए ढाढस बांधे दाती महाराज के श्रीमुख से अपने भाग्य फल जानने की कोशिश में लगे हुए हैं। जनाब इन ज्योतिषाचार्यों के इतने बड़े फैन हैं कि अपने पूरे दिन का प्लान, इनके दिये हुए ज्ञान के आधार पर ही फिक्स करते हैं। यूं समझ लीजिए हमारे शर्मा जी का सारा साफ्टवेयर इन्हीं ज्योतिषियों के द्वारा डाउनलोड किया जाता है। हमारे शर्मा जी सुबह उठते ही टी0बी0 के सामने नतमस्तक होकर समाधि लगा लेते हैं और बारी-बारी से हर चैनल के ज्योतिषियों से अपनी राशि की पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट सुनते हैं। जब जनाब सारे विशेषज्ञों की राय सुन लेते हैं तब जाकर कहीं अपने पूरे दिन का चलना-फिरना, उठना-बैठना, खाना-पीना तय करते हैं।
एक दिन तो हद ही हो गई। एक ‘बोले तारे’ कार्यक्रम में किसी ने बोल दिया कि ‘आज विपरीत लिंग के लिए आपकी सहभागिता बढ़ सकती है’। अब शर्मा जी कन्फ्यूजन में पड़ गये कि श्रीमती जी तो उन दिनों मायके में विराजमान थीं। अब इनका यह भाग्यफल आखिर पूरा कैसे हो? अब भाग्यफल है तो उसे तो घटना ही है। यही सोच लिये जनाब छत पर कपड़े फैलाने निकले। यूं समझ लीजिए उन्होंने आस-पड़ोस की सभी छतों की स्कैनिंग कर डाली। कहीं कोई भाभी जी तो इनमें इन्ट्रेस्ट नहीं ले रही। खैर छतों पर भाभी जी टाइप की तो कोई चीज नहीं मिलीं अलबत्ता दो-चार धूप सेंकती चाचियाँ जरूर दिख गयीं। अब महोदय निराश होकर आफिस में ही इस भविष्यवाणी के सच होने की आशा बनाने लगे। फ्लशबैक में जाकर जनाब सोचने भी लगे कि अभी कल ही तो बगल की रीना जी ने उन्हें लन्च आफर किया था। आज हो सकता है कुछ और आफर कर दें। अब जनाब जोश से भरे हुए और होश से डरे हुए जैसे ही आफिस पहुंचे, पता चला आज बास और रीना जी किसी आफीशियल टूर पर गये हैं। अपने दिल के हजारों टुकड़ों को फेवीक्विक से जोड़ने के बाद वह समझ गये कि यह भाग्यफल इनका नहीं उनके बाॅस का था।
हमारे शर्मा जी इन ज्योतिषियों के बताये हुए समाधान पर भी गहरी आस्था रखते हैं। जनाब की दसों उंगलियां रंग-बिरंगे नगीनों की अंगूठियों से भरी रहती हैं। गले में दो-चार ताबीज हमेशा लटकते रहते हैं। कभी इस पेड़ के नीचे दिया जलाते हैं तो कभी उस पेड़ पर धागा बांधते हैं। समझ लीजिए कि महोदय हर दिन एक भूरी गाय को रोटी खिलाने का टारगेट पूरा करते हैं। इस चक्कर में दो-तीन किलोमीटर दूर टहलते हुए न जाने कितनी सफेद, काली और भूखी गायों को नजर अन्दाज करते हुए अपने लक्ष्य को पाकर ही मानते हैं। खैर मुझे आज तक समझ ही नहीं आया कि आपकी ग्रह नक्षत्र सुधारने में भूरी गाय को ही खाना खिल।ने की शर्त आखिर क्यों ? क्या सफेद या काली गाय की दुआ में कम ताकत होती है ?

-अलंकार रस्तोगी


रविवार, 13 अक्टूबर 2013

आपदा ग्रस्त बाबा

वह बाबा जो भगवान् का पर्यायवाची तो छोडिये उन्ही की गद्दी को हिलाए पड़े हैं..वह बाबा जो अपना साम्राज्य को किसी चक्रवर्ती सम्राट की तरह बढ़ाये चले जा रहें हैं..वह बाबा जो अपने तंत्र को प्रजातंत्र से ऊपर मानने लगें हैं..वह बाबा जो नेताओं के लिए अपरिहार्य हो चुके हों..वह बाबा जो साधक साधिकाओं के लिए परम आदरणीय, अहम् अनुकरणीय हों. आज वही बाबा इस बाबा परायण देश में आपदाग्रस्त की श्रेणी में आ गए हैं ।खैर आपदा तो वाकई आ ही  गयी है । कारण जो भी रहा हो । भले ही वह किसी दुराचार के मामले में आरोपित हों । भले वह अवैध धंधों में लिप्त हों । भले वह भू- माफियों के भी बाप हों । भले ही वह लड़कियों का शोषण कर रहे हों । भले ही बाबागिरी की आड़ में न जाने क्या क्या ताड़ रहें हों । भले ही वह अपनी उम्र, गरिमा, सामाजिक मान्यता के परे गतिविधियाँ कर रहे हों । आज आपदाओं के भंवर में खुद घिर गए हैं. ।
हर वह प्राणी जो बाबागिरी के मूल तत्वों  से युक्त है, वह इस बाबा जगत के आकाश में धूमकेतु की तरह चमकने की फिराक में लगा हुआ है । खैर हर  धूमकेतु की भी अपनी एक उम्र होती है और लगता है कि आज इन्ही धूमकेतुओं पर ग्रहण लग गया है । बाबा तो बाबा  उनके इस पुनीत कार्य में उनके पूरे परिवार का भी  अपार  सह्योग रहा है। वैसे परिवार जैसी संस्था का उद्देश्य भी यही होता है। यह दूसरी बात है की यहाँ  सहयोग नकारात्मक हो रहा था ।
इस समय बाबा ब्लैक शीप की तरह आचरण पर उतर आयें हैं। नये नए कारनामे उजागर हो रहें हैं । जो बाबा दुनिया को माया मोह से विरत रहने की जुगत बताते हैं,वही इसमें लिप्त पाए जा रहें हैं। जो बाबा लाखों करोडो की जनता के सामने तरह तरह की लीलाएं करते घूम  रहे थे, आज वही बाबा अपनी ब्लैक शीप वाली हरकतों के कारण इसी जनता से भागे भागे फिर रहे हैं । इन बाबाओं की शक्ति आज लोंगो की भक्ति को धता बता कर चिढाती फिर रही है। आज बाबा ब्लैक शीप पलायन कर गए हैं । वह अपने कुकृत्यों से इतने भयभीत हैं कि उन्हें पूरी दुनिया का सामना करने का साहस लुप्त हो गया है । चलो इस प्रजातान्त्रिक विवशता वाले देश में कम से कम इन बाबाओं के  पलायन के बाद जनता कुछ राहत की सांस तो ले सकेगी ।                                                                  
                            

                       अलंकार  रस्तोगी  

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

कद बढाने का शार्ट टर्म कोर्स

राम जाने कद बढाने के इन तथाकथित कोर्स में कौन सी ऐसी जड़ी – बूटी खिला दी जाती है जिससे मात्र ढाई महीने में किसी का कद इतना बढ़ जाता है कि वह बिपाशा टाइप्ड गर्ल फ्रेंड भी पा सकता है और जॉन अब्राहम का सिंहासन भी हिला सकता है . आम आदमी की इच्छा बस एक अदद गर्ल फ्रेंड की होती है या फिर मोहल्ले में छुटभैये टाइप की हिरोगिरी करने की होती है .न जाने कितनो के यह दबे अरमान कद ऊँचा न होने के कारण सरकारी ऑफिसों की फाइलों की तरह धूल खाया करतें हैं . इनके सामने अगर जिन्न भी आ जाये तो यह अपना कद ऊँचा करने की मुराद ही मानेंगे .क्यों की इधर कद ऊँचा हुआ उधर दो मुरादें वैसे ही पूरी हो जाएँगी .
खैर आम आदमी की मुरादों की लिस्ट में भले कद का ऊँचा होना महत्वपूर्ण की श्रेणी में आता होगा लेकिन  अगर हम देश के तथा कथित ख़ास प्राणियों यानी नेताओं की बात करें तो उनके लिए कद को बढ़ाने का फंडा कोई समय सीमा में कैद कोर्स नहीं बल्कि उनकी ताकत, हिमाकत, सियासत के दांव पेंच होता है .वह अपना कद बढ़ने के लिए किसी का भी कद छोटा कर सकते हैं भले ही उसे काट कर ही छोटा क्यों न किया जाय .वह अपने कद की ऊंचाई के लिय किसी भी निचाई तक जा सकतें है . उनके लिए पद का ऊँचा होना ऊँचे कद की निशानी हैं .वह अपने कद को ऊँचा करने के लिए साम ,दाम दंड ,भेद जैसे परंपरागत हथकंडे अजमाने में यकीन करतें हैं .
उनके लिए जातिवाद ,क्षेत्रवाद ,सम्प्रदायवाद ,भाषावाद ही वह जड़ी बूटियां हैं जिनका सेवन कर वह कद बढाने की समय सीमा को मिटा सकतें हैं .धर्म के नाम पर दंगा करा कर उसमे से निकले नफ़रत और जलन की भस्म को उन्माद के गरम घोल में मिलाकर पीने से महीनो में नहीं बल्कि उनका कद मिनटों में बढ़ जाता है .वह अपना कद बढाने के चक्कर में इतना खो जाते हैं कि उन्हें यह भी याद नहीं रहता है कि उनके अपने कब पराये हो गए .
एक जमाना था जब काम कर के कद ऊँचा किया जाता था आज दाम देकर किया जाता है .पहले त्याग ,बलिदान के आधार पर कद की ऊचाई तय होती थी आज स्वार्थ और महत्वाकांक्षा ही कद का पैमाना होता है . तब कद का बढ़ना एक समयबद्ध प्रक्रिया होती थी आज कद का बढ़ना एक स्वतंत्र प्रक्रिया है .आलाकमान को पटाओ ,विरोधियों को चित करो और अपनी छवि मार्केटिंग के जरिये दुनिया भर में बेच दो ,बढ़ गया मिनटों में आपका कद .

                                  अलंकार रस्तोगी 

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

न बाबा न

इस घोर कलयुग में परम सतयुगी बाबाओं के चरम पर चल रहे बेशरम कामों की गरम शामों को देखकर अब अपना भी पापी मन इस कलम घिस प्रोफेशन को अलविदा कर बाबागीरी में कूदने को कुलबुला रहा है। यहां तो हम चाहे जितनी कलम घिस दें या फिर अपना इकलौता सिर ही कलम कर दें रहेंगे फिर भी बेचारे तथाकथित लेखक ही। सौभाग्य से हमारे पास बाबागीरी के सारे मूलभूत तत्व भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। बोलने की कला यानि वोकल आर्ट में अपना चार्ट तो वैसे ही काफी ऊपर रहा है। कामर्स से लेकर काम-रस तक, पाप-पुन्य से लेकर पालिटिक्स तक अपनी महारत सबमें हासिल है। इन टापिक्स पर धारा प्रवाह बोलने की गवाह तो वैसे ही हमारे मोहल्ले की सारी पब्लिक रही है। अब अपनी वाणी से साधकों को लायल और दुनिया को कायल बनाने के लिए अब महज किसी धार्मिक चैनल के प्राइम टाइम स्लाट पर बैकग्राउण्ड म्यूज़िक और साउण्ड इफेक्ट्स के साथ एक धाँसू परफारमेन्स का सहारा लेना बाकी रह जाता है।
किसी ने खूब कहा है कि ‘‘जो होता है अच्छा होता है’’। अब अपना भूतकाल जो हमें अभी तक भूत की तरह डराया करता था। रेप, मर्डर, चोरी, डकैती कर फालतू में हम भागे-भागे घूमते थे। बाबागीरी कर हमें इन पापों के प्रायश्चित का अवसर भी प्राप्त होगा और अपने अनुभवों से हम जनता को हम इन दुश्कर्म के मर्म से परिचित भी करा सकेंगे और फिर बाबागीरी के साथ अपना यह साइड बिजनेस भी आराम से कर सकेंगे। अभी तक हमने अपने मोहल्ले के महज दो चार प्लाट ही कब्जियाये हैं। इस बाबागीरी से एक फायदा यह भी हो जायेगा कि अपनी जो तमन्ना देशभर में मैदान से लेकर हिल स्टेशन तक प्रापर्टी बनाने की थी वह भी पूरी हो जायेगी। आश्रम की आड़ में दस-पन्द्रह हजार एकड़ जमीन तो आराम से अपने बाप की हो जायेगी। जिस डांस के कीड़े को शान्त करने के लिए हमें अपने यारों-दोस्तों की बारातो का सहारा लेना पड़ता था अब कम से कम अपने साधकों-साधिकाओं के साथ इस शौक को रोज के रोज पूरा तो कर सकेंगे। ईश्वर भक्ति तो होगी ही, तन और मन की शक्ति भी मिल जायेगी। जिस होली को खेलने के लिए हमने न जाने कहाँ-कहाँ की भाभियाँ अरेन्ज करनी पडती थीं अब बाबागीरी के बाद न जाने कितने लोग हमसे होली खेलने को खुद तरसेंगे। एक तरफ हमारे हाथ में हाईप्रेशर पिचकारी और दूसरी तरफ होली खेलने के लिए तड़पती पब्लिक। इस चार्म के वार्म की कल्पना आप भी कर सकते हैं।
इस समय अपनी लोकप्रियता का ग्राफ बड़ों-बड़ो को साफ करता चला जा रहा है। अपनी इस लोकप्रियता और बढ़ती हुयी ऐश को अपनी अगली सात पुश्तों के लिए कैश करने को अब हम कई तथाकथित देश भक्त टाईप की राजनीतिक पार्टियों के सम्पर्क में है। ईश्वर ने चाहा तो आपको प्रजातान्त्रिक विवशता के विकल्प के रूप में हम जल्दी ही उपलब्ध हो जायेंगे। अभी तक तो हम आपका लोक और और परलोक ही सुधारने का दावा करते थे अब हम इससे अपना भी लोक और परलोक सुधार सकेंगे। 
अपनी बाबागीरी थोड़ी लेटेस्ट और हाईटेक टाइप की होगी। अपने सारे प्रवचन हमारे ब्लाग पर उपलब्ध होंगे, ट्वीटर पर हमें फालो किया जा सकेगा और फेसबुक पर भी आप हमारा फेस देख सकेंगे। हमारे आर्शीवाद और प्रसाद वेबसाईट पर आनलाइन होंगे और आप अपने डोनेशन थ्रू बाबाजी डाट काम भेज सकेंगे। हम अपने कार्यक्रम पैसे देकर लगभग सारे न्यूज चैनलों में दिखाया करेंगे ताकि हम पर किसी को न्यूज बनाने का मोका ही न मिले। हम भक्तो को समाधान भी नये तरीके से देगें। पूड़ी बांटने से कैंसर से मुक्ति मिलेगी तो, पेन्सिल बांटने से सरकारी नौकरी मिलेगी, काला पर्स रखने से पैसा बढ़ेगा। हां! इस बाबागिरी के चक्कर में हमें अपने चिकने-चुपड़े चेहरे पर झाड़ीरूपी दाढ़ी जरूर उगानी पड़ेगी। जीन्स टी-शर्ट के अलावा हमने कुछ छूकर नहीं देखा अब उसी गेटप को बसंती चोले में कन्वर्ट करना पड़ेगा। खैर बहुत कुछ पाने के लिए कुछ-कुछ तो खोना पड़ेगा ही। 

            अलंकार रस्तोगी

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

बापू की आत्मा का औचक निरीक्षण

बापू की आत्मा ने इस बार अपने जन्मदिन पर देश की नब्ज टटोलने की सोंची। सबसे पहले उनकी आत्मा सरकारी आफिस में गयी। वहां उन्होंने देखा कि उनकी फोटों पर फूल-मालाए चढ़ाई जा रही है। देश भक्ति के नारों से माहौल वाकई फीलगुड कराने जैसा लगा। तभी उनकी आत्मा को जोर का झटका धीरे से लगा। सभा के खतम होते हीं मेज के नीचे से, अल्मारी की आड़ में हर तरफ बापू ही छाये हुए थे। लेकिन वह बापू जी विचारों में नहीं बल्कि रिश्वत में दी गयी और ली गयी नोटों के ऊपर फोटों के रूप में थे।
खैर उनकी आत्मा कुपित होने के बाद भी अपना ढांढस बंधाते हुए उनके द्वारा दी गयी आजादी का हाल-चाल लेने निकल पड़ी। पता चला यहां तो नेताओं को घोटाला करने की पूरी आजादी है। ठेकेदारों को दवा से लेकर दारू तक में मिलावट की फुल फ्रीडम है। नेता सरकार में आते ही कानून के बंधन से पूरी तरह आजाद हो जाते है। अब बापू की आत्मा अपने धैर्य को किसी तरह संभालते हुए आगे बढ़ चली। तभी एकाएक उन्होंने सेाचा कि उनके पास एक लाठी हुआ करती थी देखते हैं आज वह कितनों का सहारा बनी हुई है। पता चला आज वह जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला काम कर रही है। अब लाठी किसी मजबूर का नहीं बल्कि हर मजबूत का सहारा बन गयी है। जिसको देखों वही अपनी लाठी हांक कर मतदाता को भयभीत कर प्रजातंत्र का भाग्य विधाता बना हुआ है। 
हिंसा को देख बापू की आत्मा आगे बढ़ गयी। तभी उन्हें याद आया कि उनके पास गीता भी हुआ करती थी। वह गीता अवश्य ही लोगों को कर्म का मर्म बात रही होगी। बहुत ढूंढने पर गीता बापू को अदालत में मिली। वही गीता जो कभी उन्हें सत्य के मार्ग पर  आगे बढ़ने को प्रेरित करती थी आज वही गीता लोग झूठी कसमें खाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। बापू कुपित हुए और आगे बढ़ लिए। मन में उस घड़ी का भी हाल पता करने का ख्याल आया जो उन्हें समय का पाबंद बनाती थी। लेकिन यह क्या आज हर आदमी घड़ी से ज्यादा अपनी साहूलियत को ताबज्जो देता मिला। कर्मचारियों की घड़ी आॅफिस की घड़ी से एक घंटा लेट ही मिली। अपने खून पसीने से दी गयी आजादी, लोगों का संभल लाठी, पथप्रदर्शक गीता, समय की कीमत बताती घड़ी की यह दुर्दशा देख बापू की आत्मा को अपने तीन बंदरों से ही आशा बची थी। पता चला बापू का वह बंदर जो आंखें बंदकर बुरा न देखने की सीख देता था वह अब कानून बन चुका है जिसे सबूतों के अलावा कुछ नहीं दिखायी देता है। कान बंद कर बुरा न सुनो कहने वाला बंदर अब प्रशासन बन गया है जो किसी की नहीं सुन रहा है। लेकिन बापू की आत्मा को सबसे बड़ा कष्ट जब पहुचा जब उन्हें पता चला कि मुंह पर हाथ ढक कर बुरा न बोलों वाला संदेश देने वाला बंदर अब देश का प्रधानमंत्री बन  चुका है। जो किसी भी मुद्दे पर कुछ नहीं बोलता है।                              
                                   अलंकार रस्तोगी  

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

सारी सीमायें लांघता सीमा विवाद

एक हत्या होती है मरने वाला गरीबी की सीमा के नीचे का होता है और मारने वाले की अमीरी की कोई सीमा नहीं होती है. शव के सड़ने की सीमा के पहले ही पुलिस अपनी औपचारिकता की सीमा को बनाए रखने के लिए आ पहुंचती है. फिर इस थाने की पुलिस दूसरे थाने की पुलिस को उसकी सीमा याद दिलाती है। फिर सीमा विवाद प्रारंभ हो जाता है। एक सीमा विवाद हमारे मोहल्ले में भी हुआ लेकिन यहां हर कोई उस सीमा विवाद में पड़ना चाहता था। असल में हमारे मोहल्ले में सीमा नाम की एक लड़की हुआ करती थी। एक तो वह दिल फेक थी दूसरे नाक-नक्श भी माशा अल्लाह कातिलाना थे। सो इस सीमा ने तो पूरे मोहल्ले ने इतने विवाद करा रखे थे कि पूरे मोहल्ला ही सीमा विवाद के नाम से जाना जाने लगा था। यह तो करम था ऊपर वाले का कि सीमा अपनी सीमा पार करने से पहले ही ससुराल की सीमा पार कर गयी नही तो हमारे जज़्बातों की सीमा भी कभी न कभी पार हो ही जाती।
उधर चीन भी कई बार हमारी सीमां लांघने की कोशिश कर चुका है। लेकिन हर बार हमारे बहादुर सैनिकों की वीरता उन्हे उनकी सीमा याद दिला देती है। पर हमारे नेताओं की धैर्य की सीमा कभी पार नहीं होती। कुछ सीमाएं तो ऐसी होती है जो विवादो में कैद हो जाती है। पर यदि कोई विवाद कोर्ट की सीमा में चला जाएं तो वह कभी भी सीमा में कैद नहीं हो सकता। कभी वादी, विवाद की सीमा बढ़ता है तो कभी प्रतिवादी। किसी तरह एक कोर्ट की सीमा समाप्त होती है तो दूसरे कोर्ट की सीमा में अपील हो जाती है। पता चलता है कि इस दौरान बेचारे वादी की धीरज नही तो उम्र की सीमा आवश्य समाप्त हो जाती है।
सीमा विवाद हो या विवादो की सीमा, हमारे नेताओ के लिए यह कभी भी किसी परेशानी की सीमा न बन सकी। उनकी सीमाएं इतनी फैली हुई होती है कि सारी सीमाएं उनके प्रभाव से बन भी जाती है और मिट भी जाती है। उनके लिए दूसरे दलों की सीमाएं अपने लिए खोलना हो, और अपने दल की सीमा में दूसरे दलों को लाना हो, चुनाव से पहले अपनो वादो की सीमा पार कर जाना हो, चुनाव जीत जाने के बाद अपने क्षेत्र की सीमा भूल जाना हो या मंत्री बन जाने पर भ्रष्टाचार की सीमा और सत्ता के बुखार की सीमा आदि आदि सीमाए उनके समक्ष विवश हो जाती है और भारतीय जनता प्रजातंत्र की विवशता की सीमा में जकड़कर रह जाती है।
 


अलंकार रस्तोगी