मंगलवार, 8 अक्टूबर 2013

कद बढाने का शार्ट टर्म कोर्स

राम जाने कद बढाने के इन तथाकथित कोर्स में कौन सी ऐसी जड़ी – बूटी खिला दी जाती है जिससे मात्र ढाई महीने में किसी का कद इतना बढ़ जाता है कि वह बिपाशा टाइप्ड गर्ल फ्रेंड भी पा सकता है और जॉन अब्राहम का सिंहासन भी हिला सकता है . आम आदमी की इच्छा बस एक अदद गर्ल फ्रेंड की होती है या फिर मोहल्ले में छुटभैये टाइप की हिरोगिरी करने की होती है .न जाने कितनो के यह दबे अरमान कद ऊँचा न होने के कारण सरकारी ऑफिसों की फाइलों की तरह धूल खाया करतें हैं . इनके सामने अगर जिन्न भी आ जाये तो यह अपना कद ऊँचा करने की मुराद ही मानेंगे .क्यों की इधर कद ऊँचा हुआ उधर दो मुरादें वैसे ही पूरी हो जाएँगी .
खैर आम आदमी की मुरादों की लिस्ट में भले कद का ऊँचा होना महत्वपूर्ण की श्रेणी में आता होगा लेकिन  अगर हम देश के तथा कथित ख़ास प्राणियों यानी नेताओं की बात करें तो उनके लिए कद को बढ़ाने का फंडा कोई समय सीमा में कैद कोर्स नहीं बल्कि उनकी ताकत, हिमाकत, सियासत के दांव पेंच होता है .वह अपना कद बढ़ने के लिए किसी का भी कद छोटा कर सकते हैं भले ही उसे काट कर ही छोटा क्यों न किया जाय .वह अपने कद की ऊंचाई के लिय किसी भी निचाई तक जा सकतें है . उनके लिए पद का ऊँचा होना ऊँचे कद की निशानी हैं .वह अपने कद को ऊँचा करने के लिए साम ,दाम दंड ,भेद जैसे परंपरागत हथकंडे अजमाने में यकीन करतें हैं .
उनके लिए जातिवाद ,क्षेत्रवाद ,सम्प्रदायवाद ,भाषावाद ही वह जड़ी बूटियां हैं जिनका सेवन कर वह कद बढाने की समय सीमा को मिटा सकतें हैं .धर्म के नाम पर दंगा करा कर उसमे से निकले नफ़रत और जलन की भस्म को उन्माद के गरम घोल में मिलाकर पीने से महीनो में नहीं बल्कि उनका कद मिनटों में बढ़ जाता है .वह अपना कद बढाने के चक्कर में इतना खो जाते हैं कि उन्हें यह भी याद नहीं रहता है कि उनके अपने कब पराये हो गए .
एक जमाना था जब काम कर के कद ऊँचा किया जाता था आज दाम देकर किया जाता है .पहले त्याग ,बलिदान के आधार पर कद की ऊचाई तय होती थी आज स्वार्थ और महत्वाकांक्षा ही कद का पैमाना होता है . तब कद का बढ़ना एक समयबद्ध प्रक्रिया होती थी आज कद का बढ़ना एक स्वतंत्र प्रक्रिया है .आलाकमान को पटाओ ,विरोधियों को चित करो और अपनी छवि मार्केटिंग के जरिये दुनिया भर में बेच दो ,बढ़ गया मिनटों में आपका कद .

                                  अलंकार रस्तोगी 

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

न बाबा न

इस घोर कलयुग में परम सतयुगी बाबाओं के चरम पर चल रहे बेशरम कामों की गरम शामों को देखकर अब अपना भी पापी मन इस कलम घिस प्रोफेशन को अलविदा कर बाबागीरी में कूदने को कुलबुला रहा है। यहां तो हम चाहे जितनी कलम घिस दें या फिर अपना इकलौता सिर ही कलम कर दें रहेंगे फिर भी बेचारे तथाकथित लेखक ही। सौभाग्य से हमारे पास बाबागीरी के सारे मूलभूत तत्व भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। बोलने की कला यानि वोकल आर्ट में अपना चार्ट तो वैसे ही काफी ऊपर रहा है। कामर्स से लेकर काम-रस तक, पाप-पुन्य से लेकर पालिटिक्स तक अपनी महारत सबमें हासिल है। इन टापिक्स पर धारा प्रवाह बोलने की गवाह तो वैसे ही हमारे मोहल्ले की सारी पब्लिक रही है। अब अपनी वाणी से साधकों को लायल और दुनिया को कायल बनाने के लिए अब महज किसी धार्मिक चैनल के प्राइम टाइम स्लाट पर बैकग्राउण्ड म्यूज़िक और साउण्ड इफेक्ट्स के साथ एक धाँसू परफारमेन्स का सहारा लेना बाकी रह जाता है।
किसी ने खूब कहा है कि ‘‘जो होता है अच्छा होता है’’। अब अपना भूतकाल जो हमें अभी तक भूत की तरह डराया करता था। रेप, मर्डर, चोरी, डकैती कर फालतू में हम भागे-भागे घूमते थे। बाबागीरी कर हमें इन पापों के प्रायश्चित का अवसर भी प्राप्त होगा और अपने अनुभवों से हम जनता को हम इन दुश्कर्म के मर्म से परिचित भी करा सकेंगे और फिर बाबागीरी के साथ अपना यह साइड बिजनेस भी आराम से कर सकेंगे। अभी तक हमने अपने मोहल्ले के महज दो चार प्लाट ही कब्जियाये हैं। इस बाबागीरी से एक फायदा यह भी हो जायेगा कि अपनी जो तमन्ना देशभर में मैदान से लेकर हिल स्टेशन तक प्रापर्टी बनाने की थी वह भी पूरी हो जायेगी। आश्रम की आड़ में दस-पन्द्रह हजार एकड़ जमीन तो आराम से अपने बाप की हो जायेगी। जिस डांस के कीड़े को शान्त करने के लिए हमें अपने यारों-दोस्तों की बारातो का सहारा लेना पड़ता था अब कम से कम अपने साधकों-साधिकाओं के साथ इस शौक को रोज के रोज पूरा तो कर सकेंगे। ईश्वर भक्ति तो होगी ही, तन और मन की शक्ति भी मिल जायेगी। जिस होली को खेलने के लिए हमने न जाने कहाँ-कहाँ की भाभियाँ अरेन्ज करनी पडती थीं अब बाबागीरी के बाद न जाने कितने लोग हमसे होली खेलने को खुद तरसेंगे। एक तरफ हमारे हाथ में हाईप्रेशर पिचकारी और दूसरी तरफ होली खेलने के लिए तड़पती पब्लिक। इस चार्म के वार्म की कल्पना आप भी कर सकते हैं।
इस समय अपनी लोकप्रियता का ग्राफ बड़ों-बड़ो को साफ करता चला जा रहा है। अपनी इस लोकप्रियता और बढ़ती हुयी ऐश को अपनी अगली सात पुश्तों के लिए कैश करने को अब हम कई तथाकथित देश भक्त टाईप की राजनीतिक पार्टियों के सम्पर्क में है। ईश्वर ने चाहा तो आपको प्रजातान्त्रिक विवशता के विकल्प के रूप में हम जल्दी ही उपलब्ध हो जायेंगे। अभी तक तो हम आपका लोक और और परलोक ही सुधारने का दावा करते थे अब हम इससे अपना भी लोक और परलोक सुधार सकेंगे। 
अपनी बाबागीरी थोड़ी लेटेस्ट और हाईटेक टाइप की होगी। अपने सारे प्रवचन हमारे ब्लाग पर उपलब्ध होंगे, ट्वीटर पर हमें फालो किया जा सकेगा और फेसबुक पर भी आप हमारा फेस देख सकेंगे। हमारे आर्शीवाद और प्रसाद वेबसाईट पर आनलाइन होंगे और आप अपने डोनेशन थ्रू बाबाजी डाट काम भेज सकेंगे। हम अपने कार्यक्रम पैसे देकर लगभग सारे न्यूज चैनलों में दिखाया करेंगे ताकि हम पर किसी को न्यूज बनाने का मोका ही न मिले। हम भक्तो को समाधान भी नये तरीके से देगें। पूड़ी बांटने से कैंसर से मुक्ति मिलेगी तो, पेन्सिल बांटने से सरकारी नौकरी मिलेगी, काला पर्स रखने से पैसा बढ़ेगा। हां! इस बाबागिरी के चक्कर में हमें अपने चिकने-चुपड़े चेहरे पर झाड़ीरूपी दाढ़ी जरूर उगानी पड़ेगी। जीन्स टी-शर्ट के अलावा हमने कुछ छूकर नहीं देखा अब उसी गेटप को बसंती चोले में कन्वर्ट करना पड़ेगा। खैर बहुत कुछ पाने के लिए कुछ-कुछ तो खोना पड़ेगा ही। 

            अलंकार रस्तोगी

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

बापू की आत्मा का औचक निरीक्षण

बापू की आत्मा ने इस बार अपने जन्मदिन पर देश की नब्ज टटोलने की सोंची। सबसे पहले उनकी आत्मा सरकारी आफिस में गयी। वहां उन्होंने देखा कि उनकी फोटों पर फूल-मालाए चढ़ाई जा रही है। देश भक्ति के नारों से माहौल वाकई फीलगुड कराने जैसा लगा। तभी उनकी आत्मा को जोर का झटका धीरे से लगा। सभा के खतम होते हीं मेज के नीचे से, अल्मारी की आड़ में हर तरफ बापू ही छाये हुए थे। लेकिन वह बापू जी विचारों में नहीं बल्कि रिश्वत में दी गयी और ली गयी नोटों के ऊपर फोटों के रूप में थे।
खैर उनकी आत्मा कुपित होने के बाद भी अपना ढांढस बंधाते हुए उनके द्वारा दी गयी आजादी का हाल-चाल लेने निकल पड़ी। पता चला यहां तो नेताओं को घोटाला करने की पूरी आजादी है। ठेकेदारों को दवा से लेकर दारू तक में मिलावट की फुल फ्रीडम है। नेता सरकार में आते ही कानून के बंधन से पूरी तरह आजाद हो जाते है। अब बापू की आत्मा अपने धैर्य को किसी तरह संभालते हुए आगे बढ़ चली। तभी एकाएक उन्होंने सेाचा कि उनके पास एक लाठी हुआ करती थी देखते हैं आज वह कितनों का सहारा बनी हुई है। पता चला आज वह जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला काम कर रही है। अब लाठी किसी मजबूर का नहीं बल्कि हर मजबूत का सहारा बन गयी है। जिसको देखों वही अपनी लाठी हांक कर मतदाता को भयभीत कर प्रजातंत्र का भाग्य विधाता बना हुआ है। 
हिंसा को देख बापू की आत्मा आगे बढ़ गयी। तभी उन्हें याद आया कि उनके पास गीता भी हुआ करती थी। वह गीता अवश्य ही लोगों को कर्म का मर्म बात रही होगी। बहुत ढूंढने पर गीता बापू को अदालत में मिली। वही गीता जो कभी उन्हें सत्य के मार्ग पर  आगे बढ़ने को प्रेरित करती थी आज वही गीता लोग झूठी कसमें खाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। बापू कुपित हुए और आगे बढ़ लिए। मन में उस घड़ी का भी हाल पता करने का ख्याल आया जो उन्हें समय का पाबंद बनाती थी। लेकिन यह क्या आज हर आदमी घड़ी से ज्यादा अपनी साहूलियत को ताबज्जो देता मिला। कर्मचारियों की घड़ी आॅफिस की घड़ी से एक घंटा लेट ही मिली। अपने खून पसीने से दी गयी आजादी, लोगों का संभल लाठी, पथप्रदर्शक गीता, समय की कीमत बताती घड़ी की यह दुर्दशा देख बापू की आत्मा को अपने तीन बंदरों से ही आशा बची थी। पता चला बापू का वह बंदर जो आंखें बंदकर बुरा न देखने की सीख देता था वह अब कानून बन चुका है जिसे सबूतों के अलावा कुछ नहीं दिखायी देता है। कान बंद कर बुरा न सुनो कहने वाला बंदर अब प्रशासन बन गया है जो किसी की नहीं सुन रहा है। लेकिन बापू की आत्मा को सबसे बड़ा कष्ट जब पहुचा जब उन्हें पता चला कि मुंह पर हाथ ढक कर बुरा न बोलों वाला संदेश देने वाला बंदर अब देश का प्रधानमंत्री बन  चुका है। जो किसी भी मुद्दे पर कुछ नहीं बोलता है।                              
                                   अलंकार रस्तोगी  

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

सारी सीमायें लांघता सीमा विवाद

एक हत्या होती है मरने वाला गरीबी की सीमा के नीचे का होता है और मारने वाले की अमीरी की कोई सीमा नहीं होती है. शव के सड़ने की सीमा के पहले ही पुलिस अपनी औपचारिकता की सीमा को बनाए रखने के लिए आ पहुंचती है. फिर इस थाने की पुलिस दूसरे थाने की पुलिस को उसकी सीमा याद दिलाती है। फिर सीमा विवाद प्रारंभ हो जाता है। एक सीमा विवाद हमारे मोहल्ले में भी हुआ लेकिन यहां हर कोई उस सीमा विवाद में पड़ना चाहता था। असल में हमारे मोहल्ले में सीमा नाम की एक लड़की हुआ करती थी। एक तो वह दिल फेक थी दूसरे नाक-नक्श भी माशा अल्लाह कातिलाना थे। सो इस सीमा ने तो पूरे मोहल्ले ने इतने विवाद करा रखे थे कि पूरे मोहल्ला ही सीमा विवाद के नाम से जाना जाने लगा था। यह तो करम था ऊपर वाले का कि सीमा अपनी सीमा पार करने से पहले ही ससुराल की सीमा पार कर गयी नही तो हमारे जज़्बातों की सीमा भी कभी न कभी पार हो ही जाती।
उधर चीन भी कई बार हमारी सीमां लांघने की कोशिश कर चुका है। लेकिन हर बार हमारे बहादुर सैनिकों की वीरता उन्हे उनकी सीमा याद दिला देती है। पर हमारे नेताओं की धैर्य की सीमा कभी पार नहीं होती। कुछ सीमाएं तो ऐसी होती है जो विवादो में कैद हो जाती है। पर यदि कोई विवाद कोर्ट की सीमा में चला जाएं तो वह कभी भी सीमा में कैद नहीं हो सकता। कभी वादी, विवाद की सीमा बढ़ता है तो कभी प्रतिवादी। किसी तरह एक कोर्ट की सीमा समाप्त होती है तो दूसरे कोर्ट की सीमा में अपील हो जाती है। पता चलता है कि इस दौरान बेचारे वादी की धीरज नही तो उम्र की सीमा आवश्य समाप्त हो जाती है।
सीमा विवाद हो या विवादो की सीमा, हमारे नेताओ के लिए यह कभी भी किसी परेशानी की सीमा न बन सकी। उनकी सीमाएं इतनी फैली हुई होती है कि सारी सीमाएं उनके प्रभाव से बन भी जाती है और मिट भी जाती है। उनके लिए दूसरे दलों की सीमाएं अपने लिए खोलना हो, और अपने दल की सीमा में दूसरे दलों को लाना हो, चुनाव से पहले अपनो वादो की सीमा पार कर जाना हो, चुनाव जीत जाने के बाद अपने क्षेत्र की सीमा भूल जाना हो या मंत्री बन जाने पर भ्रष्टाचार की सीमा और सत्ता के बुखार की सीमा आदि आदि सीमाए उनके समक्ष विवश हो जाती है और भारतीय जनता प्रजातंत्र की विवशता की सीमा में जकड़कर रह जाती है।
 


अलंकार रस्तोगी  

सोमवार, 30 सितंबर 2013

एक मुट्ठी रेट की कीमत तुम क्या जानो ..

भारत जैसे प्रजातांत्रिक विवशता से जकड़े देश में एक मुट्ठी रेत की कीमत मात्र चंद रूपए नहीं होती। इस रेत के हर कण-कण में वह भगवान छिपा है जो नेता बनाता, सरकार बनाता है, मुख्यमंत्री बनाता है। यह रेत केवल जमीन से निकला पदार्थ नहीं है, इससे बनती है एक आलीशान इमारत जिसमें नेता, माफिया, अफसर, मंत्री जैसे खंभों का सहारा होता है। यह एक मुट्ठी रेत मात्र अवैध खनन का प्रतीक नहीं है, यह निशानी है एक ऐसे कुटुम्ब की जिसकी वसुधा में नोटों के पेड़ लगते हैं, जिसके अंदर वोटों के पहाड़ बनते हैं, अराजकता की खाने होती है, अत्याचार के पक्षी फड़फड़ाते हैं, अन्याय के फूल खिलते हैं, भ्रष्टाचार की नदिया बहती हैं और धृतराष्ट्रों का शासन होता है।
एक मुट्ठी रेत पकड़ने पर भले ही उंगलियों के पोरों से सरक जाए लेकिन जब उसे मशीनों और ट्रालियों से भरा जाता है तो हाथ की मुट्ठियाँ नोटों की गड्डियों से भर जाती हैं। शायद लोगों को यह भान हो चुका है कि रेत को मुट्ठी से उठाने का प्रयास व्यर्थ है। यह मुट्ठी तो विरोधियों का मुंह दबाने के काम में लाना कहीं अधिक हितकर है।  एक मुट्ठी अवैध रेत का एक वृहद दर्शन है। यह रोजगार है भले ही अवैध है। यह जनशक्ति का प्रतीक है भले ही वह जनशक्ति गुंडे या माफिया ही क्यों न हो। यह सत्ताधारी दल की प्रतिष्ठा का सवाल होता है भले ही सत्ता के पास किसी बात का कोई जवाब न हो। रेत का अवैध खनन मात्र रूपए बनाने की प्रक्रिया नहीं है। यह प्रजातंत्र के सहज वातावरण में आहूत किया जाने वाला राजसूय यज्ञ है जिसमें नेता और माफिया गठबंधन करके सांप्रदायिकता की अग्नि की आड़ में ईमानदार अफसरों की आहूति देते हैं। बेशर्मी का शंख बजाया जाता है और फिर सब मिलकर सत्ता की ताकत की आरती उतारने के बाद मनचाहा प्रसाद ग्रहण करते हैं।
सतयुग में ऋषियों के हवन को राक्षसगण दूषित करते थे और उनकी गुहार पर देवता राक्षसों का वध कर यज्ञ पूर्ण कराते थे। अब कलयुग है, यज्ञ का औचित्य बदल गया है। राक्षस स्वयं यज्ञ करते हैं। और जब कोई देवी उस अनैतिक और अवैध यज्ञ को रेाकने का प्रयास करती है तो उस पर सब आक्रामक हो जाते हैं। शायद कलयुग की यही परिणति है कि ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, कत्र्तव्यपरायणता आदि जैसे भाव एक मुट्ठी रेत की कीमत के आगे कहीं नहीं ठहरते हैं।
 
अलंकार रस्तोगी

बहस जारी है....

बहस जारी है....
देश के सबसे प्राइम चैनल के प्राइम टाइम पर हाल के सबसे प्राइम मुददे पर एक प्राइम बहस छिड़ी हुई थी। न्यूज एंकर रिपोर्टर कम फैशन जगत की पोस्टर ज्यादा लग रही थी, बहस में शामिल एक पुलिस अधिकारी से पूछती है-‘ इन दिनों जो रेप की घटनाएं बढ़ रहीं हैं उनमें पुलिस कितनी जिम्मेदार है?‘  पुलिस अधिकारी जिन पर फर्जी मुठभेड़ के कई मामले चल रहे थे, सीने को और चैड़ा करते हुए बोले-‘देखिए पुलिस अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाती है, अभी तक़़़ हम पर लोग रिश्वत देने के लिए उंगलियां उठाते थे कम से कम लोग यह तो जान गए हैं कि पुलिस रिश्वत देती भी है।‘ बहस के बैकग्राउंड में खबर चल रही थी ‘पांच साल की बच्ची के साथ बलात्कार‘।
‘तो मैडम आप का संगठन क्या कर रहा है?‘ सरकार के पैसों से हजारों-लांखों का फंड लेने वाले एन.जी.ओ की संचालिका जिनके आश्रम पर यौन शोषण का आरोप लगा था। अपना दामन संभाल कर बोली-‘ हमारे आश्रम में निराश्रित लड़कियां बिलकुल महफूज हैं। उन्हें आत्मरक्षा की टेनिंग भी दी जा रही है।‘ तभी एक विज्ञापन आता है जिसमें हाट ब्रांड्स के डियोडेन्ट्स लगाते ही लड़कियां चुंबक की तरह चिपकने लगती हैं। दस-पांच मिनट तक इसी प्रकार नारी सशक्तिकरण के बाद एंकर अगली बहस विपक्षी पार्टी के उन नेता जी से शुरू करती है जिनकी पार्टी में इस बार कम से कम आधा दर्जन बलात्कार के आरोपी संसद की शोभा बढ़ा रहे है।
 एकदम झक सफेद, दाग रहित कुर्ता पहने नेता जी आक्रोश की भंगिमा बनाकर कर बोले-‘हम तो कब से कह रहे है कि यह सरकार रेप के मामलां से निपटने में नाकाम रही है। हमारे कार्यकर्ता इस मुद्दे पर सरकार का संसद से सड़क तक विरोध कर रहे हे।‘ इस बार के ब्रेक में फिल्मों के प्रोमों आ रहे थे जो शीला की जवानी से शुरू होकर मुन्नी की बदनामी, चमेली की चिकनाहट और मिसकाॅल से लौंडिया के पटाने पर समाप्त हुए।
 सत्ताधारी पार्टी के नेता अपने तरकश से तीर निकालते हुए बोले-‘यह सब जनता के सामने हमारी इमेज खराब करने की विपक्षी साजिश है।‘ लेकिन आंकड़े तो यही बताते हैं कि रेप केस में दिनो दिन बढ़ोत्तरी हो रही है।.‘जी देखिए अपना प्रश्न फिर से दोहराएं मुझे कुछ सुनायी नहीं दे रहा है।‘ मैं यह कह रही थी...‘देखिए मुझे अब भी कुछ सुनायी नहीं दे रहा है।‘..‘लगता है कोई तकनीकी खराबी आ गयी हैं।‘ तभी ब्रेकिंग न्यूज आने लगी ..’’एक और गैंग रेप ..देश फिर शर्मशार‘’।
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-अलंकार रस्तोगी  

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012


          
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